स्वाधीनता आंदोलन और हिन्दी उपन्यास

साहित्य वर्तमान की कोख से निकलकर अतीत और भविष्य दोनों को आलोकित करता है। सामंती दौर में जो भूमिका काव्यों- महाकाव्यों की रही, उसी भूमिका का निर्वहन पूँजीवादी दौर में उपन्यासों ने किया। जिस प्रकार सामंती युग में काव्यों-महाकाव्यों में राज और समाज की पूर्ण अभिव्यक्ति हो रही थी, उसी प्रकार पूँजीवादी युग में उपन्यासों ने जीवन के सभी आयामों को पूर्णता के साथ अभिव्यक्त किया। आधुनिक भारत की सभी घटनाओं- परिघटनाओं को हम हिन्दी उपन्यासों में देख सकते हैं। 1857 ई. में हुए भारत के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजों की विजय अवश्य हुई, किन्तु इस संग्राम से देशवासियों में स्वाधीनता की चेतना जाग्रत हो गई। भारतीयों ने अपनी अस्मिता की खोज की। परिणामस्वरूप अंग्रेजों को यह लगने लगा कि अब इस देश में शासन करते हुए हमें प्रबल प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में बंगाल- विभाजन का प्रबल विरोध हुआ तथा गोखले, लाला लाजपतराय, तिलक और फिर महात्मा गांधीजी के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन का बिगुल बज उठा। गांधीजी सत्याग्रह, अहिंसा एवं सविनय अवज्ञा के जिन अस्त्रों का आविष्कार एवं उपयोग दक्षिण अफ्रीका के आन्दोलनों में करके प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके थे, उन्हीं अस्त्रों का उपयोग अंग्रेजों के विरुद्ध भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में उन्होंने किया। गांधीजी ने अपने अहिंसात्मक आन्दोलन से न केवल अंग्रेजी शासन की चूलें हिला दीं, वरन् भारतीय जनचेतना को व्यापक रूप में जाग्रत किया। जितना प्रभाव भारतीय जनता पर गांधीजी का था, सम्भवतः उतना किसी अन्य नेता का नहीं था। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन एक ओर तो गांधीजी के नेतृत्व में चल रहा था तो दूसरी ओर सुभाषचंद्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह- जैसे क्रान्तिकारी अपने ढंग से अंग्रेजों के खिलाफ अनवरत संघर्ष कर रहे थे। सन् 1942 में प्रारम्भ किए गए ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की व्यापकता से अंग्रेजों के पैर उखड़ गए और उन्हें लगने लगा कि अब भारतीयों को स्वाधीनता तो देनी ही पड़ेगी। अंततः देश को 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्रता प्राप्त हो गई, किन्तु अंग्रेजों ने अपनी कूटनीतिक चाल से देश को दो टुकड़ों में बांट दिया। विभाजन की इस त्रासदी को लाखों लोगों ने झेला और भारत- पाक की अवधारणा से उत्पन्न संकटों से हम आज भी जूझ रहे हैं।

स्वाधीनता आन्दोलन से हिन्दी के कई लेखक एवं उपन्यासकार प्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे हैं। गांधीजी के आह्वान पर अनेक लोगों ने सरकारी नौकरियों से त्यागपत्र दे दिया तथा हजारों लोगों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए। प्रेमचंद उनमें अग्रणी थे। उनके कहानी संकलन ‘सोजे वतन’ को अंग्रेजी सरकार पहले ही जब्त कर चुकी थी। जैनेन्द्र कुमार, विष्णु प्रभाकर ने तो सत्याग्रह में प्रत्यक्ष भाग लिया था, जबकि यशपाल, अज्ञेय, मन्मथनाथ गुप्त- जैसे साहित्यकारों ने क्रान्तिकारी के रूप में कार्य किया था। इन्हें कई वर्षों तक जेल की यातना झेलनी पड़ी थी। फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ एवं विवेकीराय की गतिविधियां भी स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़ी रही थीं। स्वाभाविक रूप से इन सभी लेखकों ने अपनी कृतियों में उस काल का प्रामाणिक दस्तावेज औपन्यासिक कथा के माध्यम से प्रस्तुत किया है।

कथा सम्राट् प्रेमचंद ने अपने उपन्यास- ‘कर्मभूमि’, ‘रंगभूमि’ एवं ‘गबन’ में स्वाधीनता आन्दोलन की झलक प्रस्तुत की है। अंग्रेज शासकों की भेद- नीति, गांधीजी की नेतृत्व क्षमता, जनता की आकांक्षा एवं स्वतन्त्रता आन्दोलन में सहयोग का चित्र प्रेमचंद के उक्त उपन्यासों में मिलता है। ‘रंगभूमि’ के ‘सूरदास’ में गांधीजी के व्यक्तित्व की झलक है तथा अहिंसा की शक्ति का वर्णन है। ‘सूरदास’ का अन्त भी कुछ उसी तरह हुआ, जैसा कालान्तर में गांधी का हुआ। ‘गबन’ में भी देशभक्तों के विरुद्ध उपनिवेशवादियों के षड्यन्त्र का वर्णन किया गया है।

यशपाल और अज्ञेय स्वयं क्रान्तिकारी रहे हैं, अतः इनके उपन्यासों में क्रान्तिकारी जीवन के अनुभवों का वर्णन है। अज्ञेय कृत ‘शेखर एक जीवनी’ में शेखर को राजद्रोह में फांसी की सजा सुनाई गई है और वह फांसी की कोठरी में बैठा अपने जीवन के चित्रों की रील देख रहा है। अज्ञेय के अपने जीवन का बहुत कुछ प्रतिबिम्ब ‘शेखर’ में दिखाई पड़ता है। उसका बहुत समय क्रान्तिकारियों के बीच व्यतीत हुआ तथा वह क्रान्तिकारी गतिविधियों में लिप्त रहा। इन सब घटनाओं में स्वाधीनता आन्दोलन का वह पक्ष दिखाई देता है, जो क्रान्तिकारी गतिविधियों से सम्बन्धित था। स्वतन्त्रता को लेकर अज्ञेय उस समय तक आश्वस्त नहीं थे, इसका पता उनके इस उपन्यास में आए इस कथन से चलता है- “मुक्ति, स्वराज, स्वतन्त्रता कितने सुन्दर शब्द हैं, किन्तु कहाँ है इनके पनपने के लिए खाद युक्त मिट्टी…… .. יין.

यशपाल के उपन्यासों ‘झूठा सच’, ‘देशद्रोही’, ‘दादा कामरेड’ एवं ‘सिंहावलोकन’ में भी आजादी की लड़ाई का चित्र उपलब्ध होता है। आजादी मिलने के बाद लोगों की आशाएं टूट गईं और उनका मोह भंग हो गया। इसकी अभिव्यक्ति भी उनके उपन्यास साहित्य में दिखाई पड़ती है।

कमलेश्वर के उपन्यास ‘सुबह, दोपहर, शाम’ में भी स्वाधीनता आन्दोलन की झलक है। बड़ी कुशलता से कमलेश्वर ने दादी के माध्यम से इस आन्दोलन को सजीव रूप में प्रस्तुत किया है। अंग्रेजों के अत्याचार से भारतीय युवक किस प्रकार लोहा लेते हैं, इसका चित्र इसमें बखूबी मिलता है।

भीष्म साहनी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘तमस’ में भी उस घृणा को चित्रित किया गया है जो हिन्दू-मुसलमानों के मन में सुलग रही थी। किस प्रकार कुछ कट्टरपंथी लोग धार्मिक उन्माद सुलगाकर अपने स्वार्थ की रोटियाँ सेकते थे, इसका कच्चा चिट्ठा इस उपन्यास में प्रस्तुत किया गया है। इसी प्रकार उन्होंने अपनी एक कहानी ‘अहं ब्रह्मास्मि’ में तत्कालीन भारतीयों की मानसिकता को अभिव्यक्ति दी है। एक ओर तो वे भारतीय थे जो गांधीजी के आन्दोलन का समर्थन कर रहे थे तथा उसे सही बता रहे थे तो दूसरी ओर ‘भाटिया’ जैसे लोग भी थे जो अंग्रेजी मानसिकता एवं रहन-सहन में इस प्रकार रंग गए थे कि आन्दोलन करने वालों को मूर्ख मान रहे थे, किन्तु जब अंग्रेजों से उसका मोह भंग हुआ तब उसे लगा कि सार्थक जीवन तो उस डुगडुगी वाले का है जो झण्डा हाथ में लिए अंग्रेज सिपाहियों के जुल्म के आगे जान दे देता है।

स्वाधीनता आन्दोलन के उपरान्त लोगों की जो आशाएं नए शासकों से थीं वे शायद पूरी नहीं हुईं और उसकी अभिव्यक्ति भी उपन्यासों में हुई। ‘मैला आंचल’ में फणीश्वरनाथ रेणु ने वावनदास की हत्या दिखाकर वस्तुतः प्रतीक रूप में गांधीवाद की हत्या दिखाई है।

सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन को केन्द्र में रखकर प्रताप नारायण श्रीवास्तव ने ‘बयालीस’ तथा विवेकी राय ने ‘श्वेत पत्र’ उपन्यासों की रचना की। यशपाल कृत ‘देशद्रोही’ तथा ‘तेरी मेरी उसकी बात’, अमृतराय कृत ‘बीज’, भगवतीचरण वर्मा कृत ‘सीधी सच्ची बातें’, मन्मथनाथ गुप्त कृत ‘जिच’ आदि में स्वाधीनता आन्दोलन का प्रभाव साफ परिलक्षित होता है। प्रताप नारायण श्रीवास्तव कृत ‘बयालीस’ नामक उपन्यास में भारतीयों की स्वतन्त्रता प्राप्ति की उत्कट अभिलाषा तथा अंग्रेजों द्वारा सत्ता कायम रखने के लिए किए गए निर्मम अत्याचारों का यथार्थ अंकन किया गया है।

यशपाल ने अपने उपन्यास ‘मनुष्य के रूप’ में पुलिस के उत्पीड़न का चित्रांकन किया है तो ‘देशद्रोही’ में कम्युनिस्ट पार्टी की स्वाधीनता आन्दोलन सम्बन्धी नीति का प्रामाणिक उल्लेख है।

विवेकी राय ने बलिया जनपद में स्वाधीनता आन्दोलन की अलख जगाई थी, जिसका प्रामाणिक विवरण उनके उपन्यास ‘श्वेत पत्र’ में मिलता है। गांधीजी के अहिंसा सिद्धान्त का उल्लेख इस उपन्यास में उपलब्ध होता है। उपन्यास का एक पात्र ‘तिवारी’ अपने सहयोगियों को सचेत करते हुए कहता है :

“आवेश में यह नहीं भूल जाना है कि हम लोगों के युद्ध नायक महात्मा गांधी हैं और पूरी लड़ाई में सत्य और अहिंसा रहित भाव में कुछ सोचना भी नहीं है। बाहर ‘करो या मरो’ का उत्साह और भीतर ‘हम स्वतन्त्र हैं’ की धारणा।”

गिरिराज किशोर द्वारा रचित उपन्यास ‘पहला गिरमिटिया’ तो स्पष्ट रूप से दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी के सत्याग्रह को केन्द्र बनाकर लिखा गया उपन्यास है। गांधीजी को केन्द्र बनाकर ऋषभचरण जैन ‘सत्याग्रह’ नामक उपन्यास लिख चुके थे। कमलाकान्त त्रिपाठी का ‘पाहीघर’ तथा कामतानाथ का ‘कालकथा’ भी स्वाधीनता आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में लिखे गए हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यास हैं।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहना उचित होगा कि स्वाधीनता आन्दोलन ने अनेक हिन्दी उपन्यासों की रचना के लिए उपन्यासकारों को प्रेरित किया। स्वतन्त्रता आन्दोलन को आधार बनाकर लिखी गई कृतियों में तत्कालीन परिवेश का यथार्थ चित्र अंकित हुआ है।

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