हिन्दी कहानी : प्रेमचंद- पूर्व युग

हिन्दी गद्य विधाओं में ‘कहानी’ सबसे सशक्त विधा बनकर विकसित हुई है। आज कहानी के पाठक अन्य सभी विधाओं की तुलना में सर्वाधिक हैं, यही कारण है कि पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों की मांग सर्वाधिक है। यही नहीं, अपितु कई पत्रिकाएँ तो केवल कहानी पत्रिकाएँ ही हैं, जो समकालीन कथाकारों की स्तरीय कहानियों के साथ-साथ उभरते हुए कहानीकारों की कहानियाँ भी छापती हैं। विगत 125 वर्षों में हिन्दी कहानी ने जो आशातीत सफलता पाई है, वह उत्साहवर्द्धक है। अन्य सभी गद्य विधाओं की अपेक्षा आज की हिन्दी कहानी में युगबोध की क्षमता सर्वाधिक दृष्टिगत होती है।

उपन्यास और कहानी दोनों में ही कथा-तत्व विद्यमान होता है, अतः प्रारम्भ में लोगों की यह धारणा थी कि उपन्यास और कहानी में केवल आकार का ही भेद है, किन्तु अब यह धारणा निर्मूल हो चुकी है। ज्यों-ज्यों कहानी की शिल्प विधि का विकास होता गया, उपन्यास से उसका पार्थक्य भी अलग झलकने लगा। वास्तव में कहानी में जीवन के किसी एक अंग या संवेदना की अभिव्यक्ति होती है, जबकि उपन्यास में जीवन की समग्रता का अंकन किया जाता है। स्पष्ट है कि कहानी की मूल आत्मा ‘एक संवेदना या एक प्रभाव’ है। कहानी का प्रमुख उद्देश्य भी कम-से-कम शब्दों में उस प्रभाव को अभिव्यक्त करना मात्र है। ब्लेटज हेमिस्टन ने कहानी की परिभाषा देते हुए लिखा है-“The aim of a short story is to produce a single effect with the greatest economy of words.” हिन्दी के प्रसिद्ध कवि एवं कथाकार अज्ञेय के अनुसार- “कहानी एक सूक्ष्मदर्शी यन्त्र है, जिसके नीचे मानवीय अस्तित्व के दृश्य खुलते हैं।” आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से कुछ शब्दों को उधार लेकर कहें, तो कह सकते हैं कि उपन्यास अगर संपूर्ण वनस्थली है तो कहानी चुना हुआ गुलदस्ता है। उपन्यास संपूर्ण जीवन की अभिव्यक्ति है तो कहानी जीवन का एक हिस्सा है। अतएव यह समझना कि कहानी का आकार बढा दिया जाए, तो वह उपन्यास हो जाता है और उपन्यास को छोटा कर दिया जाए, तो वह कहानी हो जाती है, सर्वथा भ्रामक है।

यूं तो हिन्दी कहानी की विकास यात्रा उन्नीसवीं सदी के आरंभ होती है। ‘रानी केतकी की कहानी’ (इंशा अल्ला खां), राजा भोज का सपना’ (राजा शिवप्रसाद सिंह) आदि में इसकी बानगी मिलती है। तथापि हिन्दी कहानी का परंपरागत विकास 1900 ई. से मिलता है। अतएव हिन्दी कहानी का विकास 1900 ई, से ही मानना समीचीन होगा।, क्योंकि इससे पूर्व हिन्दी में ‘कहानी’ जैसी किसी विधा का सूत्रपात नहीं हुआ था। हिन्दी की प्रथम कहानी कौन-सी है- यह एक विवादास्पद प्रश्न है। इस सम्बन्ध में जिन कहानियों का नाम लिया जाता है, वे निम्नवत् हैं:

1. रानी केतकी की कहानी (1803 ई.) : मुंशी इंशा अल्ला खां

2. राजा भोज का सपना (1850 ई, के आसपास) : सितारेहिन्द

3. इन्दुमती (1900 ई.): किशोरी लाल गोस्वामी

4. दुलाईवाली (1907 ई.) : बंग महिला

5. एक टोकरी भर मिट्टी (1901 ई,) : माधव राय सप्रे

6. ग्यारह वर्ष का समय (1903) : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

इनमें से प्रथम दो में कहानी कला के तत्व विद्यमान नहीं हैं। अतः उन्हें हिन्दी कहानी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘इन्दुमती’ को ही हिन्दी की प्रथम मौलिक कहानी माना है, जिसका प्रकाशन सन् 1900 ई. में ‘सरस्वती’ पत्रिका में हुआ था, किन्तु शिवदान सिंह चौहान के अनुसार यह कहानी शेक्सपियर के ‘टेम्पेस्ट का अनुवाद है, अतः मौलिक रचना नहीं कही जा सकती। सरस्वती पत्रिका में ही सन् 1903 में रामचन्द्र शुक्ल की कहानी ‘ग्यारह वर्ष का समय’ प्रकाशित हुई तथा सन् 1907 में बंग महिला की ‘दुलाई वाली’ कहानी छपी। इधर नवीन अनुसन्धानों के आधार पर यह सिद्ध हुआ है कि सन् 1901) में ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ कहानी का प्रकाशन ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ नामक पत्रिका में हुआ था, जिसके लेखक माधवराय सप्रे थे। अतः यही हिन्दी की सर्वप्रथम मौलिक कहानी कही जा सकती है।

हिन्दी कहानी के विकास का अध्ययन करने के लिए हम कथा सम्राट प्रेमचन्द को यदि केन्द्र बिन्दु मान लें तो उसे चार भागों में विभक्त कर सकते हैं :

1. प्रेमचन्द पूर्व हिन्दी कहानी (1900 – 1916 ई,)

2. प्रेमचन्दयुगीन हिन्दी कहानी (1916 से 1936ई,)

3. प्रेमचन्दोत्तर हिन्दी कहानी (1936 से 1954 ई

4. नई कहानी (1954 ई, –

प्रेमचन्द -पूर्व हिन्दी कहानी : 1900 – 1916

,इस काल में हिन्दी कहानी अपना स्वरूप ग्रहण कर रही थी। उसकी शिल्पविधि का विकास हो रहा था और नए-नए विषयों पर कहानियां लिखी जा रही थीं। हिन्दी की प्रथम कहानी के अन्तर्गत जिन कहानियों का उल्लेख किया जा चुका है, उनके अतिरिक्त इस काल में लिखी गई अन्य प्रसिद्ध कहानियां हैं- माधव प्रसाद मिश्र की ‘मन की चंचलता’, लाला भगवानदीन थी ‘प्लेग की चुड़ैल’ वृन्दावनलाल वर्मा की ‘राखी बन्द भाई’ और ‘नकली किला’, विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक की ‘रक्षाबन्धन’ ज्वालादत्त शर्मा की ‘मिलन’। वस्तुतः ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित कहानियों ने हिन्दी कहानी को एक दिशा प्रदान की और हिन्दी कहानी अपने विकास पथ पई. में काशी से इन्दु नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ जिसमें जयशंकर प्रसाद की कहानियां प्रकाशित होने लगी थीं। बाद में इन कहानियों का संग्रह छाया) नाम से सन् 1912 ई. में प्रकाशित हुआ। राधिका रमण प्रसाद की कहानी (कानों में कंगना भी इन्दु में सन् 1913 ई. में प्रकाशित हुई। सन् 1918 ई. में काशी से (हिन्दी गल्पमालो’ नामक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ जिसमें प्रसाद जी की कहानियों के अतिरिक्त इलाचन्द्र जोशी एवं गंगाप्रसाद श्रीवास्तव की कहानियां भी छपने लगी थीं। प्रेमचन्द जी की कुछ कहानियां भी सरस्वती में इस – काल तक छपने लगी थीं- उपर्युक्त कहानियों में बहुत_सी कहानियों पर भारतीय एवं विदेशी भाषाओं की छाया है। इन कहानियों का विषय प्रेम, समाज सुधार, नीति, उपदेश से जुड़ा हुआ है।

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी इस काल के सर्वश्रेष्ठ कहानीकार कहे जा सकते हैं। उन्होंने केवल तीन कहानियाँ लिखीं- ‘उसने कहा था’, ‘सुखमय जीवन’ और ‘बुद्ध का कांटा’। इनमें से ‘उसने कहा था’ का प्रकाशन सन् 1915 ई. में ‘सरस्वती’ में हुआ था। कथ्य एवं शिल्प दोनों ही दृष्टियों से यह अपने युग की सर्वश्रेष्ठ कहानी मानी जा सकती है। कहानी का मूल विषय है- आदर्श प्रेम जो त्याग और बलिदान के लिए प्रेरित करता है। इस दृष्टि से भी यह सशक्त एवं प्रभावपूर्ण कहानी मानी गई है। हिन्दी कथा यात्रा के इस प्रथम चरण में कहानी अभी बाल्यावस्था में ही थी। प्रेमचन्द के आगमन से पूर्व हिन्दी कहानी का कोई सशक्त रूप नहीं उभर पाया था, किन्तु अपवाद रूप में ‘गुलेरी’ जी और प्रसाद जी की कहानियों को लिया जा सकता है। इस विवेचन से स्पष्ट है कि हिन्दी कहानी का विकास लगभग 1900 ई. से प्रारम्भ हुआ और धीरे-धीरे उसका मौलिक स्वरूप एवं स्वतन्त्र सत्ता विकसित हुई। ‘उसने कहा था’ कहानी को हिन्दी कहानी के विकास के प्रथम सोपान की महत्वपूर्ण उपलब्धि कहा जा सकता है।

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