सिद्ध साहित्य : स्वरूप और प्रवृत्तियाँ

भारतीय धर्म साधना में सिद्धों का प्रादुर्भाव 8 वीं शती के आसपास माना जाता है। सिद्ध सम्प्रदाय वस्तुतः बौद्ध धर्म की विकृति से अविर्भूत हुआ है। ईसा की प्रथम शताब्दी तक आते-आते बौद्ध धर्म ‘हीनयान’ और ‘महायान’ नामक दो शाखाओं में विभाजित हो गया। हीनयान में सिद्धान्त प्रक्ष की प्रधानता थी, जबकि महायान में व्यावहारिकता पर जोर दिया जाता था। हीनयान केवल विरक्तों और संन्यासियों को आश्रय प्रदान करता था, जबकि महायान के द्वार सबके लिए खुले थे। ऊंच-नीच, छोटे-बड़े, गृहस्थ-संन्यासी, दलित, पीड़ित, स्त्री सबको निर्वाण तक पहुँचाने का दावा महायान शाखा का था।

बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार भारत से बाहर भी पर्याप्त हुआ। तिब्बत, श्रीलंका और नेपाल में यह धर्म शैव मत से प्रभावित हुआ और जन सामान्य को आकर्षित करने के लिए इसमें तन्त्र, मन्त्र, जादू- टोना एवं अभिचार का समावेश हो गया। सिद्धों ने ‘पंचमकार’(मद्य, मांस, मत्स्य, मैथुन और मुद्रा) को ‘महासुखवाद’ का आधार बनाया। एक समय में बौद्ध धर्म ने जिन विकृतियों का निषेध किया था, उन्हीं विकृतियों को सिद्धों ने आधार बना लिया। परिणामतः इसकी मूल दिशा बदल गई और त्याग, तपस्या एवं संयम का स्थान भोग-विलास ने ले लिया। साधक ‘मन्त्र-जप’ की ओर उन्मुख हो गए और इस प्रकार महायान ही कुछ समय बाद ‘मन्त्रयान’ बन गया। आगे चलकर इस मन्त्रयान के दो भाग हुए ‘वज्रयान’ और ‘सहजयान’। इनमें से वज्रयानी ही सिद्ध कहलाए तथा सहजयानी नाथ हो गए। सिद्ध मन्त्र जप से सिद्धि की आकांक्षा रखते थे, जबकि नाथपंथी सहज साधना पर बल दे रहे थे।

सिद्धों की संख्या चौरासी बताई जाती है। जो संभवतः बारह राशि और सात नक्षत्रों का गुणनफल है। इनका समय 769 ई. से 1257 ई. तक माना गया है। ये सिद्ध अपने नाम के पीछे ‘पा’ जोड़ते थे- जैसे- लुईपा, सरहपा, शबरपा, कण्हपा, कुक्करिपा आदि। सिद्ध में समाज की सभी जातियों के लोग सम्मिलित थे। जैसे- सरहपा ब्राह्मण , शबरपा क्षत्रिय, लुईपा कायस्थ, कुक्करिपा वैश्य समाज के सदस्य थे। सिद्धों ने जाति-विहीन समाज को स्थापित करने हेतु अपने नाम से जातिसूचक शब्द हटाकर ‘पा’ लगाया।
स्त्री सेवन को अपनी साधना का अंग बना लिया था और इस प्रकार धर्म तथा अध्यात्म की आड़ में स्त्री- भोग किया। इसमें समाज के तथाकथित निम्न वर्ग की स्त्रियों के साथ संभोग की परंपरा थी। ऐसी स्त्रियों को इन्होंने डोमिनी, भैरवी, महामाया या महामुद्रा नाम दिया।

सिद्ध साहित्य अर्द्धमागधी अपभ्रंश भाषा में लिखा गया है। यह भाषा वस्तुतः हिन्दी और अपभ्रंश का मिला-जुला रूप है। सिद्धों की भाषा को संधा या संध्या नाम दिया गया, जिसके माध्यम से रहस्यात्मक संदर्भों को प्रस्तुत किया जा सके। सिद्धों की रचनाएँ मूलतः उपदेशपरक, नीतिपरक एवं रहस्यपरक साहित्य हैं। इनकी कविता में शान्त और श्रृंगार रस की प्रधानता है। कुछ प्रमुख सिद्ध कवि और उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं :

1. सरहपा (8 वीं शताब्दी)
राहुलजी के मतानुसार सरहपा पहले बौद्धसिद्ध हैं, जिन्होंने चर्यागीतों और दोहाकोश की रचना की। उन्होंने सरहपा का समय 8वीं शताब्दी ईस्वी ठहराया है। इन्हें सरोरुहपाद, सरोज वज्र, राहुल वज्र भी कहा जाता था। कुछ लोग इन्हें ब्राह्मण कहते हैं, कुछ लोग क्षत्रिय। अन्य लोगों ने इन्हें शबर (बहेलिया) सिद्ध करने का प्रयास किया है। वे नालंदा विश्वविद्यालय में छात्र भी थे और अध्यापक भी। नालंदा विश्वविद्यालय में प्रवेश पाना अत्यंत कठिन होता था। प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए शास्त्रज्ञ होना अनिवार्य था। अतः हो सकता है कि वे ब्राह्मण ही रहे हों। ब्राह्मण होकर ब्राह्मणवाद का खंडन अपने-आपमें महत्त्वपूर्ण है। वे शबर की एक कन्या को ‘महामुद्रा’ के रूप में लेकर रहते थे। जाति-पाँति का यह खुला खंडन था। महामुद्रा की अवधारणा समाज में स्त्री की निम्न स्थिति के प्रति स्पष्ट विद्रोह था। धर्म के बाह्याडंबर का विरोध तो सभी सिद्धों ने किया पर सरहपा के स्वरों में जो आक्रामकता, उग्रता और तीखापन था, वह कालांतर में कबीर में ही सुनाई पड़ता है। आक्रोश की भाषा का पहला प्रयोग सरहपा में ही दिखाई देता है।

पानी और कुश लेकर संकल्प करने-करानेवाले, रात-दिन अग्निहोत्र में निमग्नोन्मग्न रहनेवाले, घड़ी-घंट बजाकर आरती उतारने वाले, मूड़-मुड़ाकर संन्यासी बनने वाले, नग्न रहने वाले, केशों को लुंचित करने वाले, झूठे साधकों की लानत-मलामत करने में वे समूचे बौद्ध साधकों में अद्वितीय थे। उन्होंने लिखा है-

‘जइ रागग्गा बिअ होइ मुत्ति ता गुणह सिआलह।
लोमुपाटणें अत्थि सिद्धि ता जुवइ णिअम्बइ।।
पिच्छी गहणो दिट्ठ मोक्ख तो मोरह चमरह।
उच्छे भोअणें होइ जाण ता करिह तुरंगह ।।’

एक दूसरे स्थान पर ब्राह्मणों की भर्त्सना करते हुए वे लिखते हैं- “यह कथन कि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुए थे, कुछ चतुर और धूर्त लोगों द्वारा गढ़ी गई कपोल कल्पना है।”

काया की कृच्छ साधना उन्हें काम्य न थी। उन्होंने सहज मार्ग पर बार-बार बल दिया है-

‘सहजे एि णिच्चल जोण किअ, समरसें णिच मणराअ।
सिद्धो सो पुणि तक्खणे, रागउ जरामरणइ भाऊ ।।’

वज्रयान से सहजयान आगे की मंजिल है। दूसरे शब्दों में सहजयान वज्रयान की सिद्धावस्था है। वज्रयान की समस्त साधनाओं को पार कर जब व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार कर लेता है, तब उसे साधनाओं की आवश्यकता नहीं रहती। साधनावस्था में साधक योगी रहेगा, किन्तु साधनाओं के पार सिद्ध हो जायेगा।
इस सहज को स्पष्ट करते हुए वे वन्यजीवन व्यतीत करने का समर्थन करने लगते हैं-गंभीर गहन वन में रहनेवाले पशुओं की तरह-

‘सरहे गहण गुहिर मग अहिआ।
पसू लोअ जिमि रहिआ।।’

सामाजिक और धार्मिक जीवन की कृत्रिमता, घुटन और रूढ़िग्रस्तता के विरुद्ध कितना तीखा व्यंग्य है! कहा जाता है कि चीन के माओवादी भी सामंती समाज के विरोध में उससे अलग रहते थे। किन्तु यहाँ पर सरह ‘पसू लोअ’ द्वारा ऐसा बिंब प्रस्तुत करते हैं जो कृत्रिमता के विरुद्ध स्वतंत्र जीवन को अत्यंत सजीव ढंग से उभारता है। इसी को आदिम जनजातीय समूह की ओर लौटना कहते हैं।

जिस समय पंडित लोग शास्त्रज्ञान के प्रकाश में परमतत्त्व का ज्ञानदान कर रहे थे, उस समय सरह उसका मखौल उड़ाते हुए देहस्थ बुद्ध को पहचानने पर जोर दे रहे थे। शास्त्रज्ञान एक विशेष वर्ग तक सीमित था जिससे वास्तविक तत्त्वबोध नहीं हो सकता था। देहस्थ बुद्ध की पहचान सहज मार्ग से ही हो सकती थी-

‘पंडिअ सअल सत्य वक्खाणअ ।
देहहिं बुद्ध वसन्त ण जाणअ ।।’

इसकी प्रतिध्वनि कबीर में भी सुनाई पड़ती है- ‘पोधी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय।’
प्राय: कहा जाता है कि बौद्ध सिद्ध गृहस्थ धर्म के विरुद्ध थे। पर सच्चाई इसके विपरीत है। सरहपा कहते हैं- ‘घर वह खज्जहि सहजे रज्जड़, किज्जइ राज-विराअ।’ राग में विराग एक औपनिषदिक विचारधारा थी। भारतीय जीवन-दर्शन मूलतः निवृत्तिमूलक था। कहना न होगा कि सिद्धों ने अपने तरीके से इसे रागोन्मुखी बनाया, आसक्तिमूलक नहीं। राग में विराग की धारणा इन्हें शैवों, जैनों और शाक्तों से अलग कर देती है।

2. कण्हपा (1199):
कण्हपा शीर्षस्थ विद्वान और पंडित थे। इनके जन्मस्थान के बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ लोग उन्हें कर्नाटक निवासी बताते हैं। उनके नाम से कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। उन्होंने असम, उड़ीसा, तिब्बत, लंका आदि की यात्राएँ कीं। तिब्बत में उनका वहुत मान था। राहुलजी के मतानुसार वे पांडित्य और कवित्व में बेजोड़ थे। सभी साधनाओं को पार कर वे अनुत्तर ज्ञानी बन चुके थे। पंडित होते हुए भी वे पंडिताई के बोझ से दबे नहीं थे। पंडिताई के बोझ को उतार उन्होंने एक किनारे रख दिया। वे ‘नाना पुराण निगमागम’ के आच्छादन के विरुद्ध थे। इनके जंजाल से मुक्त होकर ही व्यक्ति जीवन के भीतर प्रवेश कर सकता है-

‘आगम-वेअ-पुराणेहि, पाणिअ माण वहन्ति ।
पक्क-सिरीफले अलिअ जिमि बाहेरीअ भमन्ति ।।’

पंडित लोग निगमागम और पुराण को ही सब कुछ मानकर गर्व करते हैं। ये लोग उन भौंरों की तरह हैं, जो परिपक्व श्रीफल के बाहर-बाहर घूमते रहते हैं। शास्त्रवाद के विरुद्ध लोकवाद की यह पक्षधरता सिद्ध करती है कि पंडितों-पुरोहितों के विरुद्ध एक ऐसा वर्ग उभर रहा था, जिसका पूर्ण वर्चस्व निर्गुणमार्गी भक्तों में दिखाई पड़ता है।

ऐसे भी सिद्ध रहे होंगे जो अपनी सिद्धई का आतंक गृहस्थों पर जमाने में कोर-कसर नहीं करते होंगे। शास्त्रवाद के कर्मकांड और स्वर्ग-नरक के भय से क्या गृहस्थ कम आतंकित थे। सिद्धों को विवाह प्रथा में अनास्था किन्तु गार्हस्थ्य जीवन में आस्था थी। यह एक विचित्र विरोधाभास था। कण्हपा लिखते हैं-

जिमि लोण विलिज्जइ पाणिएहि तिम घरिणी लइ चित्त।
समरस जाई तक्खणे जइ पुणु ते सम णिन्त ।।

जिस तरह पानी में नमक विलीन हो जाता है, उसी प्रकार गृहिणी में चित्त लगाकर सामरस्य को प्राप्त किया जाता है।

3. शबरपा :
इनका जन्म क्षत्रिय कुल में 780 ई. में हुआ था। सरहपा से इन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था। शबरों का-सा जीवन व्यतीत करने के कारण ये शबरपा कहे जाने लगे।’ ‘चर्यापद’ इनकी प्रसिद्ध पुस्तक है। ये माया-मोह का विरोध करके सहज जीवन पर बल देते हैं और उसी को महासुख की प्राप्ति का मार्ग बतलाते हैं। इनकी कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं:

‘हेरि ये मेरि तइला बाड़ी खसमे समतुला
षुकड़ए सेरे कपासु फुटिला।
तइला वाड़िर पासेर जोहणा वाड़ी ताएला
फिटेलि अंधारि रे आकाश फुलिआ ॥’

4. लुइपा :
ये राजा धर्मपाल के शासनकाल में कायस्थ परिवार में उत्पन्न हुए थे। शबरपा ने इन्हें अपना शिष्य बनाया था। इनकी साधना का प्रभाव देख कर उड़ीसा के तत्कालीन राजा तथा मंत्री इनके शिष्य हो गये थे। चौरासी सिद्धों में इनका सबसे ऊंचा स्थान माना जाता है। इनकी कविता में रहस्य भावना की प्रधानता है। एक उदाहरण देखिए :

क्राआ तरुवर पंच विडाल, चंचल चीए पइठो काल।
दिट करिअ महासुह परिमाण, लुइ मरमइ गुरु पूच्छि अजाण ॥

5. डोम्भिपा :
डोम्भिपा मगध के क्षत्रिय वंश में 840 ई. के लगभग इनका जन्म हुआ था। विरूपा से इन्होंने दीक्षा ली थी। इनके द्वारा रचित इक्कीस ग्रंथ बताये जाते हैं, जिनमें ‘डोम्बिगीतिका’, ‘योगचर्या’, ‘अक्षरद्विकोपदेश’ आदि विशेष प्रसिद्ध हैं। इनकी कविता का एक उदाहरण इस प्रकार है :

‘गंगा जउना माझेरे बहर नाइ।
तांहि बुड़िली मातंगि पोइआली ले पार करई।
बाहतु डोम्बी बाह लो डोम्बी वाटत भइल उछारा।
सद्‌गुरु पाऊ पए जाइब पुणु जिणउरा ॥’

6. कुक्कुरिपा :
इनका जन्म कपिलवस्तु के एक ब्राह्मणवंश में माना जाता है। इनके जन्मकाल का पता नहीं चल सका है। चर्पटीया इनके गुरु थे। इनके द्वारा रचित सोलह ग्रंथ माने जाते हैं। ये भी सहज जीवन के समर्थक थे। इनकी कविता का एक उदाहरण इस प्रकार है :

‘हांउ निवासी खमण भतारे, मोहोर विगोआ कहण न जाइ ।
फेटलिउ गो माए अन्त उड़ि चाहि, जा एथु बाहाम सो एथु नाहिं।’

इन प्रमुख सिद्ध कवियों के अतिरिक्त अन्य सिद्ध कवि भी जन-भाषा में अपनी वाणी का प्रचार पद्य में करते थे; किंतु उसमें कवित्व का उतना अंश नहीं, जिसके आधार पर उसे साहित्य के विकास में योगदाता माना जा सके। जिन कवियों की पहले चर्चा की गयी है, उनका साहित्य ही हिंदी के सिद्ध-साहित्य के लिए गौरव का विषय है। इन कवियों ने हिंदी साहित्य में कविता की जो प्रवृत्तियां आरंभ कीं, उनका प्रभाव भक्तिकाल तक चलता रहा। रूढ़ियों के विरोध का अक्खड़पन, जो कबीर आदि की कविता में मिलता है, इन सिद्ध कवियों की देन है। योगसाधना के क्षेत्र में भी इनका प्रभाव पहुंचा। सामाजिक जीवन के जो चित्र इन्होंने उभारे, वे भक्तिकालीन काव्य के लिए सामाजिक चेतना की पीठिका बन गये। कृष्ण भक्ति के मूल में जो प्रवृत्ति मार्ग हैं, उसकी प्रेरणा के सूत्र भी हमें इनके साहित्य में मिलते हैं।

सिद्ध साहित्य की सामान्य प्रवृत्तियां :

1. सिद्ध साहित्य में शास्त्रीय चिन्तन पक्ष गौण है, साधना पर बल दिया गया है।
2. गुरु के महत्व को स्वीकारा गया है।
3. रूढ़ियों, बाह्याडम्बरों का विरोध है तथा शास्त्र के प्रति अवहेलना भाव है।
4. सिद्ध साहित्य में रहस्यवादी भावना के साथ-साथ योग साधना पर विशेष बल है। ब्रह्माण्ड में जो शिव और शक्ति है, पिण्ड (शरीर) में वही (सहस्रार और कुण्डलिनी है।
5. वैदिक देवताओं के प्रति अनास्था व्यक्त की गई है।
6. ब्राह्मणवाद के प्रति अवज्ञा एवं वेदों के प्रति असम्मान व्यक्त किया है।
7. चमत्कार प्रदर्शन की भावना विद्यमान है।
8. प्रतीकों का प्रयोग करते हुए चमत्कार सृष्टि की गई है।
9. सिद्धों की साधना को गुह्य साधना कहा गया, जिसके बहाने उसमें कामशास्त्र का समावेश हुआ।

10. मुक्ति या निर्वाण की तुलना में ये सिद्धियों को प्राप्त करने पर अधिक बल देते हैं।
11. जाति-पांति के प्रति अनास्था व्यक्त की गई है तथा वर्णभेद की निन्दा की गई है।

सिद्ध साहित्य का महत्व
सिद्धों का बहुत कुछ प्रभाव कबीर आदि सन्त कवियों के काव्य पर दिखाई पड़ता है। सिद्धों की उलझी उक्तियों को कबीर की उलटबांसियों का प्रेरक समझना चाहिए। वस्तुतः सन्त साहित्य का प्रारम्भिक बीज सिद्धों में ही मिलता है। कबीर ने जाति-पांति का खण्डन, बाह्याडम्बरों का विरोध, गुरु का महत्व आदि बातें सिद्धों से ग्रहण कीं। डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, “सिद्ध साहित्य का महत्व इस बात में बहुत अधिक है कि उससे हमारे साहित्य के आदि रूप की सामग्री प्रामाणिक ढंग से प्राप्त होती है। … भाषा विज्ञान की दृष्टि से भी यह महत्वपूर्ण है।” आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी भक्तिकाल पर सिद्धों का प्रभाव स्वीकार करते हैं।

यद्यपि सिद्ध साहित्य में कवित्व का वह उत्कर्ष दिखाई नहीं देता जिसकी अपेक्षा साहित्य में रहती है, तथापि हिन्दी के परवर्ती साहित्य को अनेक रूपों में इस साहित्य ने प्रभावित किया है। नवीन सामाजिक चेतना का सूत्रपात भी इसी साहित्य से हुआ, क्योंकि जनता को पहली बार जाति और वर्ण के नाम पर शोषित किए जाने की बात समझ में आई। सिद्धों की वाणी ने दलित एवं शोषित वर्ग को आशावादी सन्देश दिया और नवीन चेतना का सूत्रपात किया।

भले ही आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सिद्धों की बानियों की यह कहकर आलोचना की कि “वे साम्प्रदायिक शिक्षा मात्र हैं, अतः शुद्ध साहित्य की कोटि में नहीं आ सकतीं” तथापि सिद्ध साहित्य का परवर्ती साहित्य पर व्यापक प्रभाव पड़ा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।
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संदर्भ ग्रंथ- सूची :
हिन्दी साहित्य का इतिहास- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, 1929 ई.
हिन्दी साहित्य का आदिकाल- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, 1955 ई.
हिन्दी साहित्य का इतिहास- संपादक- डाॅ. नगेन्द्र, मयूर बुक्स, अंसारी रोड, दरियागंज, नयी दिल्ली, 1973 ई.
हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास- डाॅ. रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज, 1986 ई.
हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास- डाॅ, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1996 ई.

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