सन् 1936 से 1954 तक की कहानी को हिन्दी कथा- जगत में ‘प्रेमचन्दोत्तर कहानी काल’ के रूप में जाना जाता है। प्रेमचन्दोत्तर हिन्दी कहानी किसी एक दिशा की ओर अग्रसर नहीं हुई, अपितु विविध दिशाओं में उसका विकास हुआ। कहानी इस काल की केन्द्रीय विधा रही है। अतः उसने जीवन और जगत के विविध पक्षों को अपनी परिधि में समेटने का प्रयास किया। इस काल में एक ओर तो प्रगतिवादी विचारधारा से अनुप्राणित कहानीकारों ने प्रगतिवादी कहानियाँ लिखीं तो दूसरी ओर ‘मनोविश्लेषणात्मक’ कहानीकारों ने ऐसे विषयों पर कहानियाँ लिखीं, जिनमें व्यक्ति मन की आन्तरिक परतों को खोलकर देखा गया था।
प्रगतिवादी कथाकारों में सर्वप्रमुख हैं- यशपाल, जिन्होंने मार्क्सवादी चेतना से अनुप्राणित होकर अनेक कहानियों की रचना की। वर्ग- संघर्ष, शोषण, सामाजिक एवं भौतिक रूढ़ियों पर आक्रोश उनकी कहानियों के विषय रहे हैं। यशपाल की लिखी कहानियों के कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनमें प्रमुख हैं- ‘वो दुनिया’, ‘पिंजड़े की उड़ान’, ‘फूलों का कुर्ता’, ‘तर्क का तूफान’ एवं ‘चक्कर क्लब’ आदि। यशपाल जी के कथा- शिल्प पर टिप्पणी करते हुए डॉ. भगवतस्वरूप मिश्र ने लिखा है- “कथा शिल्प और कथ्य की दृष्टि से यशपाल जी प्रेमचन्द के बहुत नजदीक हैं, पर वे अपनी कहानी को प्रेमचन्द की तरह समस्या का समाधान देने वाले किसी आदर्श बिन्दु पर नहीं पहुंचाते, अपितु यथार्थ की कठोरता के तीखे व्यंग्य का बोध भर करा देते हैं।” रांगेय राघव, नागार्जुन, अमृतराय, मन्मथनाथ गुप्त इसी परम्परा के अन्य कथाकार हैं।
मनोविश्लेषणवादी कहानी लेखकों में अज्ञेय, इलाचन्द्र जोशी एवं जैनेन्द्र के नाम उल्लेखनीय हैं। अज्ञेय ने व्यक्ति के परिवेश और संघर्ष को अपनी कहानियों में उकेरा है। उनकी कहानियों में मनोविश्लेषण के साथ-साथ प्रतीकात्मकता एवं बौद्धिकता का प्रभाव भी है। अज्ञेय ने कहानी को बौद्धिक एवं वैचारिक आधार प्रदान किए तथा प्रतीकों एवं बिम्बों के प्रयोग में वृद्धि की। अज्ञेय की कुछ प्रसिद्ध कहानियों के नाम हैं- ‘रोज’, ‘खितीन बाबू’, ‘पुलिस की सीटी’, ‘हजामत का साबुन’, ‘कोठरी की बात’, ‘गैंग्रीन’, ‘पठार का धीरज’ आदि। उनके कई कहानी- संग्रह अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। यथा- ‘विपथगा’, ‘परम्परा’, ‘शरणार्थी’, ‘कोठरी की बात’, ‘जयदोल’, ‘अमर बल्लरी’ और ‘ये तेरे प्रतिरूप’।
जैनेन्द्र की कहानियों में व्यक्ति-मनोविज्ञान के दर्शन होते हैं। मानवीय दुर्वलताओं का यथार्थ चित्रण जैनेन्द्र की कहानियों में प्रमुखता से हुआ है। वे प्रसाद की भाँति आदर्श पात्रों को जन्म नहीं देते, अपितु यथार्थ के धरातल से उठाए गए ‘पात्रों’ को अपनी कहानी का विषय बनाते हैं। उनके पात्र अपने पास-पड़ोस से उठाए हुए मानव-चरित्र हैं। जैनेन्द्र जी की कहानियों का शिल्प भी अलग है, क्योंकि कहानी की मूल संवेदना अपनी उष्णता के साथ उस में अन्त तक व्याप्त रहती है। उनकी प्रसिद्ध कहानियाँ हैं- ‘जाह्नवी’, ‘पत्नी’, ‘मास्टर साहब’, ‘परख’, ‘एक रात’, ‘ध्रुवयात्रा’, ‘ग्रामोफोन का रिकार्ड’, ‘पान वाला’ आदि।
मनोविश्लेषणवादी परम्परा को गति प्रदान करने वाले एक अन्य कहानीकार हैं- इलाचन्च जोशी, जिनकी कहानियाँ मनोविज्ञान की दृष्टि से ‘केस हिस्ट्री- सी प्रतीत होती हैं। जोशी जी की कहानियों में दमित काम-वासना, अहं, कुण्ठा का चित्रण किया गया है तथा इनमें घटनाओं की अपेक्षा चरित्र पर विशेष बल दिया गया है। जोशी जी की प्रमुख कहानियाँ हैं- ‘रोगी’, ‘मिस्त्री’, ‘परित्यक्ता’, ‘चौथे विवाह की पत्नी’, ‘प्रेतात्मा’ आदि। उनके कहानी संग्रहों के नाम हैं- ‘खण्डहर की आत्माएं’, ‘डायरी के नीरस पृष्ठ’ ‘आहुति’ और ‘दिवाली’ आदि।
प्रेमचन्दोत्तर कहानीकारों में से एक वर्ग उन कहानीकारों का है, जिन्हें यथार्थवादी कहानीकार कहा जा सकता है। इन कथाकारों ने आधुनिक समाज की विभिन्न परिस्थितियों एवं समस्याओं का उद्घाटन यथार्थपरक दृष्टिकोण से किया है। चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, रमाप्रसाद पहाड़ी, देवीदयाल चतुर्वेदी, भगवती चरण वर्मा, जानकी वल्लभ शास्त्री, रामवृक्ष बेनीपुरी, विष्णु प्रभाकर, राधाकृष्ण आदि इसी वर्ग के कहानीकार हैं। इनमें से कुछ कहानीकारों के संकलन इस प्रकार हैं- ‘चन्द्रकला’, ‘अमावस’, ‘भय का राज्य’ (सभी चन्द्रगुप्त विद्यालंकार), ‘सफर’, ‘अधूरा चित्र’, ‘सड़क पर’ (सभी के रचयिता रमाप्रसाद पहाड़ी) इन संकलनों की कहानियों में आधुनिक समाज की अनैतिकता, मूल्यहीनता एवं उच्छृंखलता का सुन्दर निरूपण किया गया है।
कहानीकारों के एक वर्ग ने अपनी कहानियों में कामवासना, सौन्दर्यलिप्सा एवं यौन- समस्याओं का चित्रण स्वच्छन्द रूप में किया है। इन्हें यौनवादी कथाकार कहा जा सकता है। इस वर्ग के प्रमुख कहानीकारों में आरसीप्रसाद सिंह (कालरात्रि) द्विजेन्द्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’ (छोटा डॉक्टर), किशोर साहू (टेसू के फूल), मधुसूदन (उजाले से पहले), ब्रजेन्द्रनाथ गौड़ (विखरी कलियां), आदि के नाम लिए जा सकते हैं। कुछ अन्य कहानीकारों ने युद्ध, क्रान्ति, शिकार आदि साहसिक विषयों को अपनी कहानियों का विषय बनाया। प्रभाकर माचवे ने द्वितीय विश्वयुद्ध से सम्बन्धित घटनाओं पर कहानियाँ लिखकर ‘संगीनों का साया’ संकलन तैयार किया। पण्डित श्रीराम शर्मा ने ‘शिकार कथाओं’ का श्रीगणेश किया, किन्तु उनकी शिकार कथाएं वास्तविक घटना पर आधृत होने के कारण ‘रिपोर्ताज’ के अधिक निकट हैं, कहानी के तत्व इनमें अत्यल्प हैं। हास्य-व्यंग्य से भरपूर कहानियों के लेखक के रूप में जी. पी. श्रीवास्तव ने प्रसिद्धि प्राप्त की। उन्होंने शिष्ट परिहास द्वारा समाज के खोखलेपन की खिल्ली उड़ाई है। हरिशंकर परसाई, अमृतलाल नागर और अन्नपूर्णानन्द की कहानियों में भी यह प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है।
उक्त विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रेमचन्दोत्तर कथाकारों में मनोविश्लेषण प्रवृत्ति की प्रधानता है। वर्ग- संघर्ष एवं यथार्थवाद की ओर रुझान भी कुछ कहानीकारों का रहा है तथा उन्होंने प्रतीकात्मकता एवं सांकेतिकता का सहारा भी लिया है। इस काल में प्रेम, रोमांस एवं यौन समस्याओं को भी कहानीकारों ने अपनी विषय वस्तु बनाया है। युगीन परिवेश को पूर्णतः व्यक्त करने में इस काल की कहानी ने महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। कहानी के शिल्प ने भी इस काल में उत्तरोत्तर प्रगति की है। अब कहानी में घटना विरलता के साथ-साथ व्यक्ति चरित्र पर विशेष बल दिया जाने लगा।