नई कहानी : कथ्य और शिल्प

सन् 1950 के बाद की कहानी विषय और शिल्प दोनों ही दृष्टियों से पूर्ववर्ती कहानी से भिन्न है। पुरानी कहानी में जहाँ पूर्वाग्रह है, वहीं नई कहानी पूर्वाग्रह से मुक्त है। पुराने, कहानीकार ने अपनी आँखों पर समाजवादी, नैतिकतावादी, रूमानी या मनोविश्लेषणवादी चश्मा लगाकर जीवन को देखा, किन्तु नए कहानीकार ने सभी वादों और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर जीवन को यथार्थ रूप में देखने-समझने का प्रयास किया। उसकी कहानी ‘भोगे हुए यथार्थ’ से जुड़ी है, इसलिए वह अधिक प्रामाणिक है। आधुनिक मानव के जीवन को विविध कोणों से देखकर उसका सही परिप्रेक्ष्य में चित्रण करने का प्रयास इन कहानीकारों ने किया है। डॉ. नामवर सिंह के अनुसार- “अभी तक जो कहानी सिर्फ कथा कहती थी, या कोई चरित्र पेश करती थी अथवा एक विचार को झटका देती थी, वही….. जीवन के प्रति एक नया भाव-बोध जगाती है।” नयी कहानी में विषयों की विविधता के साथ-साथ ‘शिल्प का नयापन’ भी विद्यमान है। उसमें प्रभावान्विति पर इतना जोर नहीं है, जितना जीवन के संश्लिष्ट खण्ड में व्याप्त संवेदना पर है। नया कहानीकार किसी दार्शनिक, सामाजिक अथवा राजनीतिक विचारधारा से प्रतिबद्ध न होकर विशुद्ध अनुभूति की सचाई और विषय की यथार्थता के प्रति प्रतिबद्ध होता है। हिन्दी के प्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर ने नई कहानी के विषय में अपना मत व्यक्त करते हुए लिखा है- “पुरानी और नई कहानी के बीच बदलाव का बिन्दु है- ‘नई वैचारिक दृष्टि’।” आज का कहानीकार पहले से अधिक सूक्ष्मदर्शी और संवेदनशील है। वह बिना किसी लाग-लपेट के तटस्थता एवं सच्चाई के साथ यथार्थ को अपनी रचना के माध्यम से व्यक्त करता है। डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त के अनुसार -“नई कहानी का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य है- कथा तत्व का ह्रास……नया कहानीकार कथानक को महत्व नहीं देता।”

यह सर्वविदित है कि स्वतन्त्रता के बाद हमारी मानसिकता में बदलाव आया है। प्रजातान्त्रिक मूल्यों के सम्बन्ध में हमारी आदर्शवादी कल्पनाएं झूठी सिद्ध हुई हैं तथा जीवन के कठोर यथार्थ से हमारा परिचय और भी घनिष्ठ हुआ है। भूख, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा- जैसी समस्याओं ने हमारे जन-जीवन को पूरी तरह प्रभावित किया है, अतः कहानियों के विषय अब जीवन की वास्तविक समस्याओं से पूरी तरह जुड़े हुए दिखाई पड़ रहे हैं। प्रसिद्ध कथाकार मार्कण्डेय के अनुसार- “नई कहानी से हमारा मतलब उन कहानियों से है जो सच्चे अर्थों में कलात्मक निर्माण हैं, जो जीवन के लिए उपयोगी हैं और महत्वपूर्ण होने के साथ ही उसके किसी न किसी नए पहलू पर आधारित हैं।”

नई कहानी की विकास यात्रा बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में प्रारम्भ हुई। सन् 1955 ई. में ‘कहानी’ पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ, जिसमें प्रकाशित होने वाली कहानियाँ परम्परागत कहानियों से कुछ पृथक् दिखाई पड़ रही थीं- ‘कथा’ और ‘टेक्नीक’ दोनों ही दृष्टियों से। बाद में इन कहानियों को 1955-56 के आस-पास ‘नई कविता’ की तर्ज पर ‘नई कहानी’ कहा जाने लगा। नई कहानी में जीवन के यथार्थ को ईमानदारी के साथ चित्रित किया गया है तथा वह कल्पना प्रसूत होने पर भी अपने आस-पास के जीवन की कहानी दिखती है। उसमें विषय वैविध्य भी है। यदि हम उसे विभिन्न वर्गों में विभक्त करना चाहें तो निम्न वर्गों में बांट सकते हैं :

1. ग्रामीण अंचल की कहानियाँ

2. नगर बोध की कहानियाँ

3. कस्बाई जीवन की कहानियाँ

4. यथार्थ बोध की कहानियाँ

5. यौन समस्याओं का चित्रण करने वाली कहानियाँ

6. व्यंग्य प्रधान कहानियाँ।

छठे दशक के आरम्भ में हिन्दी कहानी में ग्रामीण अंचल की कहानियों ने पाठकों को विशेष आकृष्ट किया। इन कहानीकारों में शिवप्रसाद सिंह, मार्कण्डेय, फणीश्वरनाथ रेणु के नाम प्रमुख हैं। इनकी कहानियों में गांव की तस्वीर साफ-सुथरे रूप में उभरी है, किन्तु उनमें रोमांस की प्रधानता है, शिवप्रसाद सिंह के कहानी संकलनों के नाम हैं- ‘आर-पार की माला’, ‘मुर्दा सराय’, ‘इन्हें भी इन्तजार है’ आदि। मार्कण्डेय के कहानी संकलनों में ‘महुए का पेड़’, ‘भूदान’, ‘हंसा जाई अकेला’, ‘माही’ आदि प्रमुख हैं। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियों में आंचलिकता उभर आई है। ‘लाल पान की बेगम’ और ‘तीसरी कसम’ उनकी प्रमुख कहानियां हैं।

नई कहानी में नगर बोध की प्रवृत्ति प्रमुखता से व्यक्त हुई है। आज के नगरीय जीवन में पाया जाने वाली सतही सहानुभूति, आन्तरिक ईर्ष्या, स्वार्थपरता, जीवन की कृत्रिमता, आदि की अभिव्यक्ति कमलेश्वर, निर्मल वर्मा, अमरकान्त की कहानियों में देखी जा सकती है। नयी कहानी में आधुनिक बोध कई अर्थों में विद्यमान है। मध्यकालीन मूल्यों के ह्रास तथा नवीन वैज्ञानिक सोच ने आज की कहानी को प्रभावित किया है। नगरीय जीवन की वास्तविक स्थितियों का चित्रण तो इन कहानियों में है ही साथ ही आधुनिक बोध से उत्पन्न अकेलेपन एवं रिक्तता की अनुभूति, युगीन संक्रमण एवं तनावों को भी उसमें अभिव्यक्त किया गया है। मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, अमरकान्त, कमलेश्वर, निर्मल वर्मा की कहानियों में ये स्थितियां देखी जा सकती हैं।

नई कहानी को समृद्ध करने में हिन्दी कथा लेखिकाओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है। उषा प्रियंवदा, मन्नू भण्डारी, कृष्णा सोबती, शिवानी, मेहरुन्निसा परवेज एवं रजनी पन्निकर- जैसी कहानी लेखिकाओं ने पति-पत्नी एवं नारी-पुरुष सम्बन्धों को अपनी कहानियों में प्रमुखता से अभिव्यक्त किया है। ‘मैं हार गई’, ‘त्रिशंकु’, ‘तीन निगाहों की एक तस्वीर’ ‘यही सच है’ आदि मन्नू भण्डारी के प्रमुख कहानी संकलन हैं।

प्रेम और विवाह के कटु- मधुर सम्बन्धों का चित्रण भी राजेन्द्र यादव की ‘टूटना’, मन्नू भण्डारी की ‘यही सच है’ और कहानीकारों ने किया है। कमलेश्वर की ‘बयान’, ‘राजा निरवंसिया’, मोहन राकेश की ‘अपरिचित’ कहानियाँ इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। मोहन राकेश की ‘मिस पाल’, कमलेश्वर की ‘तलाश’, उषा प्रियंवदा की ‘छुट्टी का एक दिन’, अमरकान्त की ‘जिन्दगी और जोंक’ कहानियाँ टूटी हुई नारी या टूटे हुए पुरुष की कहानियाँ हैं।

नए कहानीकारों में कुछ और चर्चित नाम हैं- महीपसिंह, दिनेश पालीवाल, राजकुमार भ्रमर, नरेन्द्र कोहली, गोविन्द मिश्र, श्रद्धा कुमार, ममता कालिया, निरुपमा सेवती, दीप्ति खण्डेलवाल आदि। यद्यपि यह सूची किसी भी सीमा तक बढ़ायी जा सकती है, तथापि यहाँ प्रमुख कहानीकारों का उल्लेख करके सन्तोष कर लिया गया है।

‘नई कहानी’ हिन्दी कथा- विकास-यात्रा की एक उपलब्धि है। यद्यपि इस कहानी पर मूल्यहीनता का आरोप लगाया जाता है, क्योंकि जीवन के शाश्वत मूल्य जैसी किसी चीज में इनका कोई विश्वास नहीं है, तथापि हम इसे इस आरोप से बरी कर सकते हैं। नई कहानी में मूल्यहीनता न होकर मूल्यों का परिवर्तन है। नयी कहानी किसी एक क्षण या एक स्थिति या एक संवेदना को व्यक्त करने वाली कहानी है। मानव की दृष्टि बदलने के साथ ही नई कहानी का शिल्प भी बदला है।

नई कहानी का विषय क्षेत्र सीमित है -ऐसा आरोप इस पर लगाया गया है तथा प्रयोगधर्मिता ने भी इसके स्वरूप को विकृत किया है-इस धारणा को भी नई कहानी से जोड़ा गया है। केवल रचना चमत्कार एवं बुद्धि वैभव के बल पर ‘प्रेमचन्द’ नहीं बना जा सकता। इस तथ्य को नए कहानीकार यदि ध्यान में रखें और जीवन की गहन वास्तविक अनुभूति से जुड़ें तो वे अधिक प्रभावशाली रचना को जन्म दे सकेंगे।

हिन्दी कहानी लोकप्रियता के चरम शिखर पर है, अतः यह आशा की जा सकती है कि कहानी का भविष्य भी उज्ज्वल है। समकालीन कहानीकार अपने परिवेश के प्रति सजग हैं। वे प्रमुख घटनाओं के प्रति अपनी रचनात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। बदलते हुए परिवेश में जिन नवीन मूल्यों का विकास हो रहा है, उसे नया कहानीकार आत्मसात कर रहा है। कमलेश्वर की कहानी ‘तलाश’ इस बदलते हुए जीवन मूल्य की सार्थक तलाश है। आज से पच्चीस-तीस वर्ष पहले शायद ही कोई युवती अपनी विधवा मां को किसी अन्य पुरुष से सम्बन्ध बनाने के औचित्य को उस शालीनता एवं शिष्टता से अंगीकार करती, जिस शिष्टता से तलाश की समी अपनी ‘ममी’ की आवश्यकता को अनुभव कर घर से दूर हॉस्टल में रहने चली जाती है। समकालीन कहानी में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को सूक्ष्मता से व्यक्त किया गया है। आज की कहानी में जीवन के आर्थिक पक्ष का भी स्पर्श किया गया है। समान्तर कहानी आन्दोलन से जो कहानीकार सामान्य मनुष्य के आर्थिक संघर्ष को अपनी नियों में अभिव्यक्ति दे रहे हैं। आज का कहानीकार व्यवस्था के प्रति आक्रोश से भरा हुआ है। राजनीति, समाज, धर्म, शिक्षा, प्रशासन में आए भाई-भतीजावाद एवं भ्रष्टाचार ने आम आदमी की कठिनाइयों को और भी बढ़ाया है। नया कहानीकार इन सबको अपनी कहानियों में अभिव्यक्ति दे रहा है। नई कहानी में बौद्धिकता के प्रति आग्रह बढ़ गया है। आज की कहानी केवल घटनाओं का चित्रण ही नहीं करती, अपितु पाठकों को चिन्तन-मनन के लिए विवश करती है।

नई कहानी की भाषा एवं शिल्प में भी परिवर्तन हुआ है। रेणु जी की भाषा में ग्रामीण अंचल की सुगन्ध है; यथा- “है किसी के पास एक घूर जमीन भी अपनी इस गांव में।” नये कहानीकारों ने जटिल संवेदनाओं को व्यक्त करने के लिए लाक्षणिक एवं विम्बात्मक भाषा का प्रयोग किया है। कमलेश्वर, निर्मल वर्मा, मोहन राकेश की कहानियों में भाषा का यह स्वरूप देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए, निर्मल वर्मा की भाषा को देखा जा सकता है। “जब कभी दरवाजा खुलता है, धूप का एक सांवला सा धब्बा खरगोश की तरह भागता हुआ घुस आता है।” नई कहानी की भाषा में सांकेतिकता अधिक है, वर्णनात्मकता कम। कमलेश्वर की ‘तलाश’ कहानी में बुझे हुए सिगरेट के टुकड़ों, जीने का खुला दरवाजा एवं तकिए पर पड़े गड्‌ढे से यह संकेत दिया गया है कि सुमी की ममी किसी प्रेमी के साथ मिला करती है। इसी प्रकार भीष्म साहनी की कहानी ‘चीफ की दावत’ में मां सम्पूर्ण परम्परा का बोध कराती है। जो परम्परा हमारी दृष्टि में हेय है वही विदेशियों को आकृष्ट करती है और जब विदेशी उसकी प्रशंसा करते हैं तो हमें भी वह मूल्यवान लगने लगती है।

नई कहानी का शिल्प भी बदला है। उसने डायरी, रिपोर्ताज, रेखाचित्र, संस्मरण, आदि की शिल्प को भी अपनाया है। ‘रसप्रिया’, ‘परिन्दे’, ‘जिन्दगी और जोंक’, ‘सावित्री नम्बर दो’ आदि कहानियाँ इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। परर्साई जी की कहानियाँ व्यंग्यात्मक हैं तो ‘पंच लाइट’ में सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार किया गया है। राजेन्द्र यादव भी शिल्प के प्रति विशेष जागरूक रहे हैं। शिल्पगत चेतना के बावजूद नई कहानी ‘कलावादी’ नहीं है। हां इतना अवश्य है कि वे कथ्य के अनुरूप अपने शिल्प में परिवर्तन करती रही हैं।

सामयिक कहानियाँ नगर बोध एवं महानगरीय जीवन तक केन्द्रित हो गई हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़ी कहानियाँ अब बहुत कम दिखाई दे रही हैं। समकालीन कहानी का फलक बहुत विस्तृत है। जीवन के हर क्षेत्र से जुड़ी समस्या आज कहानी का विषय बन रही है। कहानी को ‘द्वन्द्व या ‘आन्दोलन’ के घेरे में कैद करने से उसकी शक्तिमत्ता क्षीण ही होती है, अतः वास्तविक अर्थ में कहानी वही है, जिसमें जीवन के अनुभूत सत्य को साहित्यिक रूप प्रदान किया गया हो। जीवन की कोई ऐसी समस्या नहीं है जो कहानीकार की दृष्टि से छूटी हो।

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