यह सर्वविदित है कि सिद्धों की भाँति ही नाथपंथ की उत्पत्ति बौद्ध धर्म से हुआ। बौद्ध धर्म के कारण भारतीय समाज में आमूलचूल परिवर्तन हुआ, तथापि ईशा की प्रथम सदी तक आते-आते इसमें अनेक प्रकार की विकृतियों का समावेश हो गया। परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म ‘हीनयान’ और ‘महायान’ में विभाजित हो गया। हीनयान में साधकों, संन्यासियों और गृहत्यगियों को स्थान मिला, जबकि महायान में सबके लिए दरवाजे खुले थे। इसमें संन्यासियों के साथ ही गृहस्थों को भी शामिल किया गया। यहाँ पंचमकार के साथ ही जादू- टोना, तंत्र- मंत्र का सहारा लिया गया। यही कारण है कि महायान बाद में ‘मन्त्रयान’ बन गया और पुन: ‘वज्रयान’ और ‘सहजयान’ में बंट गया। वज्रयानी सिद्ध कहलाये और सहजयानी नाथ।
नाथपंथ प्रवर्तक गोरखनाथ थे, पर गोरखनाथ का कुछ भी ऐतिहासिक संदर्भ नहीं मिलता है, न उनकी जन्मतिथि का साक्ष्य प्राप्त होता है, न ही मृत्युतिथि का। जन्मस्थान का भी कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है। उनके नाम पर लिखे गये संस्कृत ग्रंथों की प्रामाणिकता भी संदिग्ध है। हिन्दी में लिखी हुई उनकी वाणी तो अपनी भाषा के कारण और भी अप्रामाणिक सिद्ध होती है। ऐतिहासिक प्रमाण मिले, न मिले पर लोक द्वारा प्रमाणित है कि वे एक महान ऐतिहासिक महापुरुष थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में- “शंकराचार्य के बाद इतना प्रभावशाली और इतना महिमान्वित भारतवर्ष में दूसरा नहीं हुआ। भारतवर्ष के कोने-कोने में उनके अनुयायी आज भी पाये जाते हैं। भक्ति आन्दोलन के पूर्व सबसे शक्तिशाली धार्मिक आन्दोलन गोरखनाथ का भक्तिमार्ग ही था। गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े नेता थे।”
गोरखनाथ का जन्म कहाँ हुआ था, कुछ पता नहीं है। कुछ लोग उन्हें दक्षिण देश का निवासी बताते हैं, कुछ पंजाब का, कुछ नेपाल का। ब्रिग्स का अनुमान है कि वे पंजाब में जन्मे थे। सामान्यतः उन्हें काँगड़ा-निवासी माना जा सकता है। वहाँ पर उनके प्रभाव अब भी मौजूद हैं-विशेष रूप से धर्मशाला के पास ज्वालादेवी में।
गोरख के समय के बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है, किन्तु अभिनव के साक्ष्य पर इनका समय भी वही निश्चित किया जा सकता है जो मत्स्येन्द्रनाथ का है। अभिनव के तंत्रालोक में ‘मच्छंद’ का उल्लेख हुआ। मच्छंद मत्स्येन्द्रनाथ ही हैं। तंत्रालोक 11वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में लिखा गया। चूँकि मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथ गुरु-शिष्य होने के साथ समकालीन भी थे, अतः उनका समय भी 10-11वीं शताब्दी ठहराना ही तर्कसंगत है। मत्स्येन्द्रनाथ के गुरु जालंधरनाथ माने जाते हैं। भोट के ग्रन्थों में भी जलन्धरनाथ को ‘आदिनाथ’ (अर्थात् सबसे पहले वाले नाथ) कहा गया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार पंजाब का जलन्धर शहर उन्हीं के नाम से बसा है। उन्हें ही बालनाथ कहा गया है।
उस काल के महात्माओं में यात्रा करने की अद्भुत शक्ति थी, चाहे वे शंकराचार्य हों या गोरखनाथ। गोरख ने पंजाब, गुजरात, काठियावाड़, उत्तरप्रदेश, नेपाल, असम, उड़ीसा आदि की यात्राएँ की थीं। इनका प्रभाव इन प्रदेशों की सीमाओं को लाँघकर सारे देश में फैला हुआ था। नाथों की संख्या 9 मानी जाती है। जिनके नाम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस प्रकार बताए हैं:
1. मत्स्येन्द्रनाथ,
2. गाहनिनाथ
3. ज्वालेन्द्रनाथ
4. करणिपानाथ,
5. भर्तृनाथ और
6. नागनाथ
7. चर्पटनाथ
8. रेवानाथ
9 गोपीचन्द्रनाथ।
इस सूची में गोरखनाथ का नाम न आने का कारण यह बताया गया है कि गोरख-पंथियों के अनुसार गोरखनाथ ही भिन्न-भिन्न समय में अलग-अलग नामों से अवतरित हुए हैं। गोरखनाथ के महत्व को प्रतिपादित करते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिए लिखा है- “गोरखनाथ अपने युग के सबसे महान धर्म नेता थे। उनकी संगठन शक्ति अपूर्व थी। उनका व्यक्तित्व समर्थ धर्मगुरु का व्यक्तित्व था। उनका चरित्र स्फटिक के समान उज्ज्वल, बुद्धि भावावेश से एकदम अनाविल और कुशाग्र तीव्र थी।” वस्तुतः वे एक ऐसे अक्खड़ नेता थे, जिन्होंने रूढ़ि पर चोट करते समय न तो रंचमात्र दुर्बलता दिखाई और न किसी से समझौता किया। भावुकता से वे कोसों दूर थे यही कारण है कि वे भक्ति और प्रेम से नितान्त अछूते रहे।
गोरखनाथ के ग्रन्थों की संख्या 40 मानी जाती है, किन्तु डॉ. पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल ने उनकी केवल 14 रचनाएँ ही मानी हैं। उनकी रचनाओं का संकलन बड़थ्वालजी ने ‘गोरखबानी’ के नाम से प्रकाशित कराया है। उनकी रचना का एक नमूना उद्धृत है :
‘तुंबी में तिरलोक समाया त्रिवेणी रिब चंदा।
बूझो रे ब्रह्म गियानी अनहद नाद अभंगा।।’
अर्थात् माया की तूंबी में तीनों लोक- त्रिकुटी और सूर्य-चंद्र समाए हुए हैं, इसलिए हे ब्रह्मज्ञानियो ! अखण्ड अनहद नाद को समझो। इसी प्रकार वह धीर उसे मानते हैं जिसका चित्त विकारों के साधन उपस्थित होने पर भी विचलित नहीं होता :
‘नौ लख पातरि आगें नाचें पीछे सहज अखाड़ा।
ऐसे मन लै जोगी खेलै तब अंतरि बसै भण्डारा ।।’
नाथ सम्प्रदाय के महत्वपूर्ण तथ्य :
1. नाथ पंथ का प्रभाव हिन्दुओं के साथ-साथ मुसलमानों पर भी था। बहुत से मुसलमान जो हिन्दुओं की ही भांति निम्न श्रेणी के थे, नाथ पंथ में आए और गेरुए वस्त्र पहनकर ‘नाथ योगी’ बन गए।
2. नाथ पंथी योगी कान की लौ में बड़े-बड़े छेद करके स्फटिक के भारी कुण्डल पहनते हैं। इसीलिए इन्हें ‘कनफटा’ योगी भी कहा जाता है।
3. नाथ पंथ का प्रचार पंजाब और राजपूताने की ओर अधिक था।
गोरखनाथ का संप्रदाय ‘नाथ संप्रदाय’ कहा जाता है। नाथोक्त होने के कारण उसका नाम नाथ संप्रदाय पड़ा। इसे ‘सिद्धमत’, ‘सिद्धमार्ग’, ‘योगमार्ग’, ‘योग संप्रदाय’, ‘अवधूत मत’ भी कहा गया है। बौद्धसिद्धों की तुलना में नाथों ने भी अपने को सिद्ध कहा हो तो इसमें आश्चर्य क्या है? मानस के प्रारंभ में गोस्वामीजी ने जिन सिद्धों को ‘याम्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वस्म्’ कहकर याद किया है, वे नाथ सिद्ध ही हैं। वे ईश्वर की स्थिति घट में मानते थे। ‘भवानीशंकरौ’ ही उनके ईश्वर थे। गोरख भक्ति-विरोधी थे। अतः गोस्वामीजी को कहना पड़ा- ‘गोरख जगायो जोग भगति भगायो लोग।’ गोस्वामीजी के ठीक विपरीत कबीर ने गोरख को सादर स्मरण किया है। गोस्वामीजी का ‘धूत कहौ अवधूत कहौ’ का अवधूत भी गोरखपंथी ही है। इससे कबीर और गोस्वामीजी के वैश्विक दृष्टिकोण का अन्तर स्पष्ट हो जाता है।
प्रश्न होता है कि गोरखनाथ का देशव्यापी प्रभाव क्यों पड़ा? क्या सिर्फ इसलिए कि उन्होंने तंत्र का पत्ला छोड़कर योगमार्ग अपनाया? तांत्रिक तो वे भी रहे होंगे। अन्यथा कदलीवन में कौल योगिनियों से घिरे अपने गुरु मत्स्येन्द्र का उद्धार कैसे करते ? हाँ, उनका तंत्र बौद्धसिद्धों का वीभत्स तंत्र नहीं था। चमत्कार वे भी करते थे, पर उनका चमत्कार योगजन्य था। इतना अवश्य है कि तंत्रजन्य वीभत्स व्यापारों से संत्रस्त जनता को उन्होंने भयमुक्त किया। वे ब्रह्मचर्य और योगाभ्यास पर ऐकातिक बल देते थे।
बौद्धसिद्ध निरीश्वरवादी थे तो नाथसिद्ध ईश्वरवादी। इसलिए वे धर्मप्राण जनता की आस्तिक विचारधारा से जुड़ गए। निरीश्वरवादियों के लिए इस देश की जमीन कभी ज़रखेज़ नहीं रही। उनका ईश्वरवाद सगुण ईश्वर के प्रति आस्थावान न होकर निरंजन के प्रति आस्थावान था। इसीलिए गरीब मुसलमान भी उनके साथ हो गये। उनका जाति-पाँति विरोध धर्म-विरोध की खाई को भी पाट रहा था।
जाति-पाँति का भेद भी एक प्रकार का वर्ग-भेद ही है। उच्च वर्ण के लोग निम्न वर्ण के लोगों का भाँति-भाँति से शोषण करते थे। वर्णाश्रम से अंतरण करना, अपने को अतिवर्णाश्रमी कहना, एक प्रकार का वर्गान्तरण ही है। गोरखनाथ स्वयं ब्राह्मण थे। इसको, अतिक्रमित कर वे अतिवर्णाश्रमी हो गये थे। नाथपंथियों के यहाँ ब्रह्म की प्राप्ति के लिए पक्षपात विनिर्मुक्त होना आवश्यक है। पक्षपात का मतलब है देहाभिमान। देहाभिमान द्विजातियों के पल्ले पड़ा था। योगी इससे मुक्त था क्योंकि उसने अपने को स्वतः घोषित कर रखा था कि वह ‘अतिवर्णाश्रमी’ यानी देहाभिमान मुक्त है।
मुसलमानी राज्य स्थापित होने पर बादशाहों ने जोर-जुल्म से हिन्दुओं को इसलाम कबूल करने को बाध्य किया। इनमें अधिकांश गरीब लोग थे। जात्यंतरण की एक नयी प्रक्रिया शुरू हुई। इन नये मुसलमानों में बहुत लोग नाथपंथी योगी हो गये। इस तरह नाथपंथियों की एक नयी जाति बन गई ‘ना हिन्दू ना मुसलमान।’ इस तटस्थ जातिविमुक्त जाति के प्रति मुसलमानों का रुख कठोर नहीं हुआ। उत्तर भारत के नाथपंथी मठों के महंतों को पीर भी कहते थे। इस तरह हिन्दुओं-मुसलमानों के बीच के भेदभाव को दूर करने का सिलसिला इसी समय से शुरू हो गया।
शंकराचार्य की तरह गोरख ने यात्राएँ ही नहीं कीं बल्कि विभिन्न मतों के आचार्यों से शास्त्रार्थ भी किया। वे अत्यंत मेधावी और चोटी के शास्त्रज्ञ थे। अपने प्रतिद्वन्द्वियों को पछाड़कर ही वे लोगों का ध्यान नाथपंथ की ओर आकृष्ट कर सके होंगे। अनुश्रुतियाँ बताती हैं कि कापालिकों से उनका बराबर संघर्ष होता रहा। बौद्ध कापालिक कण्हपा से उनके संघर्ष की बात सर्वविदित है। कौल संप्रदाय, कालामुख, पाशुपत, कापालिक मत, शाक्तमत आदि में जो कुछ सात्विक था उसे उन्होंने ग्रहण कर लिया।
जिस तरह पूरा उत्तर भारत राजनीतिक दृष्टि से विभिन्न टुकड़ों में बँटाँ हुआ था उसी तरह धार्मिक दृष्टि से भी अनेक मत-मतान्तरों में विभाजित था। गोरख ने सारे मतभेदों से ऊपर उठकर देश को धार्मिक एकसूत्रता में बाँधा। वे व्यक्तिगत रूप से भी दीन-दुखियों की सहायता करते थे। स्वाभाविक है कि वे एक लोकप्रिय धार्मिक नेता के रूप में मान्यता प्राप्त करते।
गोरखनाथ ने संस्कृत में भी लिखा है और देश्य भाषा में भी। पर उनकी प्रामाणिकता निःसंदिग्ध नहीं है। मिश्रबंधुओं के मतानुसार गोरख के संस्कृत ग्रंथों की संख्या 9 है। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने गोरख-लिखित अट्ठाईस पुस्तकों का उल्लेख किया है। पर उनका यह भी कहना है कि “इन पुस्तकों में अधिकांश के कर्ता स्वयं गोरखनाथ नहीं थे।” आगे चलकर कुछ और ग्रंथों के मिल जाने पर गोरख के ग्रंथों की कुल संख्या 35 हो जाती है। इनमें कितने प्रामाणिक तथा कितने अप्रामाणिक हैं, कुछ कहा नहीं जा सकता। पर सिद्धसिद्धांत पद्धति, गोरक्ष संहिता, अमरौघशासनम् और महार्थ मंजरी को कुछ लोग गोरख-रचित मानते हैं। किन्तु किसी को गोरख-लिखित प्रमाणित नहीं किया जा सका है। सिद्धसिद्धांत पद्धति को शुक्लजी नाथपंथी ग्रंथ मानते हैं। पर इन ग्रंथों द्वारा नाथपंथी सिद्धांतों पर प्रकाश पड़ता है। संक्षेप में नाथपंथी तीन बातों पर जोर देते हैं- (1) योगमार्ग, (2) गुरु गरिमा, (3) पिंड ब्रह्मांडवाद। तांत्रिक बौद्धों का योगमार्ग लोकबाह्य और अमांगलिक है जबकि नाथपंथियों के योगमार्ग में हठयोग की प्रमुखता है। हठयोग की जटिल प्रक्रिया गुरु के अभाव में संभव नहीं। इसलिए गुरु का महत्त्व अपने आप सिद्ध है। पिंड में ही ब्रह्मांड है, इसकी प्रतिध्वनि नाथपंथी पदावली के साथ कबीर आदि में विद्यमान है। इससे इतना तो सिद्ध है कि नाथपंथी लोग अपढ़ नहीं थे, शास्त्रज्ञ विद्वान थे। बौद्धसिद्धों की तरह जाति-पाँति तथा तीर्थाटन आदि का खंडन इन्होंने भी किया है।
गोरखनाथ की कई हिन्दी रचनाओं का भी उल्लेख किया जाता है। मिश्रबंधुओं ने गोरखनाथ को हिन्दी का प्रथम गद्य लेखक माना है। पर इसके प्रमाण में जो गद्यांश उद्धृत किये गये हैं वे अप्रामाणिक हैं। यह भाषा उस समय की हो ही नहीं सकती। उनके स्रोत का भी पता नहीं है। शुक्लजी ने उनकी दस हिन्दी पुस्तकों का उल्लेख किया। पर उनका कहना है कि “ये सब ग्रंथ गोरख के नहीं, उनके अनुयायी शिष्यों के रचे हैं।” उन्होंने हिन्दी में लिखी पुस्तकों को संस्कृत में लिखी नाथपंथी पुस्तकों का सार माना है। पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने सर्वप्रथम गोरख की बानियों का संग्रह ‘गोरखबानी’ (1930) में छपवाई। उन्होंने गोरख की चालीस पुस्तकों का उल्लेख किया है। ‘सबदी’ को वे सबसे अधिक प्रामाणिक मानते हैं। भाषा के आधार पर इनमें से एक भी रचना प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती। शुक्लजी इन्हें 14वीं शताब्दी में लिखा गया मानते हैं। पर ये और भी परवर्ती हैं, 15वीं शताब्दी के पहले की नहीं हो सकतीं।
इन हिन्दी रचनाओं के बारे में द्विवेदीजी कहते हैं- “संस्कृत में योगियों के जो ग्रंथ उपलब्ध हैं, वे साधारण तौर पर साधना मार्ग के ही व्याख्यापरक ग्रंथ हैं। उनसे योगियों के दार्शनिक और नैतिक उपदेशों का आभास बहुत कम मिलता है। हिन्दी में गोरखनाथ के नाम से जो अनेक पद और सबदी आदि प्रचलित हैं, उनमें साधनामार्ग की व्याख्या की गई है, पर उनमें योगियों के धार्मिक विश्वास, दार्शनिक मत और नैतिक स्वर का परिचय अधिक स्पष्ट भाषा में मिलता है।” शुक्लजी के कथन और द्विवेदीजी के कथन में कोई भेद नहीं है। हिन्दी रचनाओं में सार संस्कृत ग्रंथों का ही है। हिन्दी भाषा में लिखे जाने के कारण वह अधिक स्पष्ट है।
उनकी हिन्दी कविता के कुछ नमूने निम्नलिखित हैं-
‘गुर कीजै गहिला निगुरा न रहिला,
गुर विन ग्यांन न पायला रे भाईला।
दूधै धोया कोइला उजला न होइला,
कागा कठै पहुप माल हंसबा न मैला ।।’
‘नाथ बोलै अमृत वांणी। बरिषैगी कंबली पांणी।।
गाड़ि पडरवा बांधिले खूँटा। चलें दमामा बजिले ऊँटा ।।’
‘धसै सहंस इकीसौं जाप। अनहद उपजे आपहि आप ।।
बंका नालि मैं ऊगे सूर। रोम रोम धुनि बाजै सूर ।।’
‘हवकि न बोलिबा ठवकि न चलिया। धीरै धरिवा पावँ ।।
गरबं न करिवा सहज रहिबा । भणत गोरस रावँ ।।
यंद्री का लड़बड़ा, जिम्भा का फूहड़ा। गोरस कहै ते परतसि चूहड़ा।।
काछ का जती मुख का सती। सो सत पुरुष उतमो कथी ।।’
उपर्युक्त उद्धरणों की भाषा के आधार पर इन रचनाओं को 15वीं शताब्दी के पहले का नहीं माना जा सकता। शुक्लजी ने इस भाषा को ठीक ही सधुक्कड़ी कहा है। ‘सधुक्कड़ी’ का अर्थ भाषा साधुत्व से हीन होना नहीं है। सधुक्कड़ी में खड़ी बोली के साथ अनेक प्रादेशिक भाषाओं का मिश्रण होता है। गोरख की सधुक्कड़ी एक प्रकार की है और कबीर की दूसरे प्रकार की। गोरखबानी की भाषा खड़ी बोली मिश्रित राजस्थानी है और कबीर की खड़ी बोली मिश्रित राजस्थानी, ब्रजी और भोजपुरी।
शुक्लजी ने सिद्धों और नाथों की रचनाओं को साहित्य की कोटि में नहीं गिना है- “सिद्धों और योगियों की रचनाएँ साहित्य कोटि में नहीं आतीं और योगधारा काव्य या साहित्य की कोई धारा नहीं मानी जा सकती।” इस सम्बन्ध में कुछ शोधकर्ताओं ने बचकाना सवाल उठाया है कि जब भक्ति साहित्य की धारा हो सकती है तो योग ने कौन-सा अपराध किया है? साहित्य की अपनी कुछ बुनियादी शर्तें होती हैं- संवेदना, कल्पना तथा आन्तरिक संरचना। योगधारा में इनमें से कुछ नहीं मिलता। और उन आलोचकों और शोधकर्ताओं का भगवान ही मालिक है जो उनमें रस, अलंकार आदि खोजकर हठयोगी की सार्थक भूमिका निभाते हैं। इनके विवेचन की सार्थकता इतनी ही है कि इनके प्रतिपाद्य सामाजिक-धार्मिक दृष्टिकोण का प्रभाव भक्त कवियों पर पड़ा है, मुख्यतः निर्गुणधारा के कवियों पर।