हिन्दी पत्रकारिता की संघर्ष यात्रा

हिन्दी पत्रकारिता की संघर्ष-यात्रा

– डाॅ. उमेश कुमार शर्मा

भारत में हिन्दी पत्रकारिता का उद्भव सामाजिक राजनीतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक क्रांति के गर्भ से हुआ है। इस क्षेत्र में आने वाले लोग पत्रकारिता को पेशे के रूप में नहीं, अपितु मिशन के रूप में अपनाया। राज और समाज के प्रति देशवासियों में परिवर्तनकामी चेतना का प्रसार इसका केन्द्रीय उद्देश्य था। इसलिए प्रसिद्ध शायर अकबर इलाहाबादी ने ठीक ही कहा है –

“खीचो न कमानों को, न तलवार निकालो।

जब तोप मुकाबिल हो, अखबार निकालो।।”

भारत में हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत वस्तुत: ‘उदंत मार्तण्ड’ से मानी जाती है। इसका प्रकाशन युगल किशोर शुक्ल के संपादकत्व में कलकत्ता से 30 मई, 1826 को साप्ताहिक अंक के रूप में प्रारंभ हुआ। यह प्रत्येक मंगलवार को निकलता था। राज और समाज के लिए समर्पित यह पत्रिका हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रकाशपुंज है। आज हिन्दी पत्रकारिता विकास की चरमावस्था में है, लेकिन हम ‘उदंत मार्तण्ड’ को विस्तृत नहीं कर सकते। अभाग्य से सरकारी सुविधाओं के अभाव, सत्ता के विरोध और ग्राहकों की उदासीनता के कारण यह पत्रिका 4 दिसम्बर, 1827 ई. को सदा के लिए बंद हो गयी। बहुत दुखी होकर संपादक ने अंतिम अंक की प्रस्तावना में लिखा है –

“आज दिवस लौं उग चुक्यौं मार्तण्ड उदन्त।

अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत।।”

भारतीय नवजागरण के अग्रदूत कहे जाने वाले राजा राममोहन राय के संरक्षण तथा नीलरतन हलदार के कुशल संपादन में 10 मई,1829 ई. से कलकत्ता से ही ‘बंगदूत’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह पत्रिका अंग्रेजी, बंगला, फारसी और हिन्दी में एक साथ प्रकाशित हो रही थी। यह प्रत्येक सप्ताह के रविवार को पाठकों को प्राप्त होती थी। इस पत्रिका ने राजा राममोहन राय के द्वारा प्रवर्तित ‘ब्रह्म समाज’ संबंधी विचारों के प्रसार में अपनी गंभीर भूमिका निभाई।

हिन्दी क्षेत्र से हिन्दी में निकलने वाली पहली पत्रिका है-‘बनारस अखबार’। इसका प्रकाशन जनवरी, 1845 ई. में मासिक पत्रिका के रूप में हुआ। इसके संचालक थे राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द तथा संपादक थे श्री गोविन्द नारायण थत्ते। बनारस अखबार में अरबी, फारसी भाषा के शब्दों का बाहुल्य मिलता है। यूँ भी सितारेहिन्द संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के विरोधी तथा उर्दू- फारसीनिष्ठ हिन्दी के समर्थक थे।

सन् 1850 में तारामोहन मिश्र ने काशी से ‘सुधाकर’ नामक पत्रिका निकाला। भाषा की दृष्टि से यह अपने समय की सबसे महत्त्वपूर्ण पत्रिका थी। समसामयिक लेख- आलेख के प्रकाशन से इस पत्रिका ने अपनी अलग पहचान बनाई। इसके तुरंत बाद 1852 ई. में मुंशी सदासुख लाल ने ‘बुद्धि- प्रकाश’ का संपादन किया। इस पत्रिका में इतिहास, भूगोल, साहित्य, दर्शन, शिक्षा तथा विज्ञान से संबंधित विविध विषयक लेख- आलेख प्रकाशित हो रहे थे। ज्ञान के अनेक क्षेत्रों से संबद्ध होने के कारण इसके पाठक अपेक्षाकृत अधिक थे।

‘समाचार- सुधावर्षण’ हिन्दी का प्रथम दैनिक पत्र है, जिसका प्रकाशन जून,1854 ई. में श्याम सुंदर सेन के संपादकत्व में कलकत्ता से प्रारंभ हुआ। सामाजिक- राजनीतिक विषयों के अतिरिक्त व्यापार- संबंधी विज्ञापन का प्रकाशन इस पत्र में प्रमुखता से हो रहे थे। 8 फरवरी,1857 ई. को महान राष्ट्रवादी चिंतक अजीमुल्ला खाँ ने ‘पयामे आजादी’ का संपादन किया। अंग्रेजी राज का विरोध और भारतीय स्वाधीनता का उद्घोष करने के कारण इसे अंग्रेजों का कोपभाजन बनना पड़ा। कुछ ही दिनों के बाद इसका प्रकाशन बंद करवा दिया गया।

हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में भारतेन्दु हरिश्चंद्र का आगमन युगांतकारी सिद्ध हुआ। इन्होंने क्रमश: तीन पत्रिकाओं- ‘कविवचन सुधा’, ‘हरिश्चंद्र मैग्जीन’, तथा ‘बाला बोधिनी’ का संपादन किया। कविवचन सुधा का प्रकाशन 15 अगस्त, 1867 ई. से प्रारंभ हुआ। इस पत्रिका में जायसी का ‘पद्मावत’, कबीर के दोहे और साखियाँ, देव रचित ‘अष्टयाम’ आदि साहित्यिक कृतियों का प्रकाशन क्रमिक रूप से हुआ। साथ ही हिन्दी की तद्युगीन कविताएँ भी इसमें छपती थीं। हरिश्चंद्र मैग्जीन का संपादन और प्रकाशन 15 अक्टूबर, 1873 से हुआ। ज्ञात हो कि आठ अंकों के बाद इस पत्रिका का नाम ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’ हो गया। हिन्दी गद्य के विकास में इस पत्रिका का ऐतिहासिक योगदान रहा। इसमें पुरातत्व, उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना के साथ ही राजनीतिक, दार्शनिक तथा देशभक्तिपूर्ण लेख प्रकाशित होते थे। इसी पत्रिका का संदर्भ देते हुए भारतेन्दु ने अपने इतिहास जर्नल ‘कालचक्र’ में लिखा है – ”हिन्दी नई चाल में ढली 1873 ई. में।” भारतेन्दु जी राजा राममोहन राय के ब्रह्म -समाज संबंधी विचारों से काफी प्रभावित थे, इसीलिए उन्होंने स्त्री- शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए 1874 ई. में ‘बाला बोधिनी’ नामक पत्रिका का संपादन किया। यह महिलाओं के लिए निकलने वाली हिन्दी की पहली पत्रिका है।

भारतेन्दु युग के प्रसिद्ध साहित्यकार बालकृष्ण भट्ट ने 1877 ई. में ‘हिन्दी प्रदीप’ का संपादन किया। आर्थिक अभावों के बावजूद इस पत्रिका ने हिन्दी की समृद्धि के लिए लगातार 27 वर्षों तक काम किया। 1881 ई. में बदरी नारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ ने ‘आनंद कादंम्बिनी’ का संपादन किया। हिन्दी आलोचना के विकास में इस पत्रिका का सराहनीय योगदान है। इसके बाद 1883 ई. में प्रताप नारायण मिश्र ने कानपुर से ‘ब्राह्मण’ का संपादन किया। ये भारतेन्दु के सच्चे अनुयायी थे। इस पत्रिका ने हिन्दी कविता तथा गद्य को समृद्ध बनाया। इसी के माध्यम से प्रताप नारायण मिश्र ने ‘हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान’ का नारा बुलंद किया था। एक संवेदनशील साहित्यकार होने के कारण विधवाओं की दयनीय स्थिति से मर्माहत होकर इसमें लिखा था- ”कौन करेजो नहिं कसकत, सुनि विपति बाल विधवन की!”

ब्राह्मण पत्रिका भी निरंतर आर्थिक विपन्नता से जूझती रही। संपादक अपने ग्राहकों से जो दिवेदन किया है, उसी से इसकी स्थिति को समझा जा सकता है- ”आठ मास बीते जजमान, अब तो करो कुछ दक्षिणा दान।”

भारत की प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था नागरी प्रचारिणी सभा, काशी से सन् 1896 में ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह पत्रिका त्रैमासिक थी। इसके प्रधान संपादक थे- बाबू श्यामसुंदर दास तथा संपादक मंडल में सुधाकर द्विवेदी, राधाकृष्ण दास, वेणीमाधव, रामचंद्र शुक्ल आदि शामिल थे। इस पत्रिका में भाषा, साहित्य, अनुसंधान तथा समालोचना से संबंधित लेख प्रकाशित होते थे। अनेक अज्ञात कृतियों की खोज तथा प्राप्त कृतियों के रचनाकार की तलाश में निरंतर सक्रिय रहने वाली यह पत्रिका हिन्दी भाषा और साहित्य की समृद्धि में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

हिन्दी पत्रकारिता का तीसरा और सबसे प्रभावशाली पड़ाव है- द्विवेदी -युग। इस युग का प्रारंभ सन्1900 ई. में सरस्वती के प्रकाशन से हुआ। यह पत्रिका ज्ञान के समग्र क्षेत्र को एक साथ प्रकाशित करने का उद्देश्य लेकर शुरु हुआ। इसके संपादक मंडल में शामिल थे- बाबू श्यामसुंदर दास, किशोरीलाल गोस्वामी,राधाकृष्ण दास, कार्तिक प्रसाद खत्री और जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’। इस पत्रिका का प्रधान उद्देश्य था – भारत का राष्ट्रीय- सांस्कृतिक जागरण। अभाग्यवश 1901 ई. में वैचारिक मतभेद के कारण संपादक मंडल भंग हो गया। फिर श्यामसुंदर दास ने अकेले दो वर्षों तक इसका संपादन किया। सन् 1903 में रेलवे की नौकरी छोड़कर इस पत्रिका के संपादन का काम आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने किया। दरअसल, यहीं से हिन्दी साहित्य में एक नये युग का प्रवर्तन हुआ, जिसे ‘द्विवेदी-युग’ के नाम से जाना जाता है। द्विवेदी जी ने सरस्वती के माध्यम से साहित्य में व्याप्त अश्लीलता की परंपरा का निषेध किया, हिन्दी भाषा का परिष्कार किया, गद्य के साथ ही खड़ीबोली को कविता की भाषा बनाया, कविता के विषय को विराट फलक प्रदान किया और साथ ही साहित्य में उपेक्षित स्त्री पात्रों की ओर कवि का ध्यान आकृष्ट कराया। इसी के फलस्वरूप ‘प्रियप्रवास’, ‘साकेत’, ‘यशोधरा’, तथा ‘विष्णुप्रिया’ आदि की रचना हुई।

विदित हो कि इसी युग में खड़ीबोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य ‘प्रियप्रवास’ लिखा गया। इसी युग में सरस्वती पत्रिका की कोख से राष्ट्रीकवि मैथिलीशरण गुप्त, महान आलोचक और निबंधकार रामचन्द्र शुक्ल, कथा-सम्राट प्रेमचंद, महाकवि निराला का अवतरण हुआ। अतएव, इसे हिन्दी पत्रकारिता का स्वर्णयुग कहा जा सकता है। इसी दौरान 1907 ई. में महामना मदनमोहन मालवीय ने ‘अभ्युदय’ तथा 1910 ई. में गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ का संपादन कर राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का प्रयत्न किया। इस श्रृंखला में राष्ट्रवादी कवि माखनलाल चतुर्वेदी विशेष रूप से स्मरणीय हैं। उन्होंने 1919 ई. में जबलपुर से ‘कर्मवीर’ का संपादन कर देश के युवाओं की सुषुप्त चेतना को झकझोर दिया। इसी पत्रिका में ‘पुष्प की अभिलाषा’ शीर्षक कविता प्रकाशित हुई, जिसमें कवि ने जो आह्वान किया, वह देखिए –

“मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ पर देना तुम फेक।

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक।।”

हिन्दी पत्रकारिता के विकास में महात्मा गांधी की सराहनीय भूमिका रही है। गांधी जी ने 1921 ई. में ‘हिन्दी नवजीवन’ का संपादन अहमदाबाद से किया। इस पत्रिका का उद्देश्य था- अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी भाषा का व्यापक प्रचार – प्रसार। 1930 ई. में गाँधी जी ने ‘हरिजन’ का संपादन कर दलितोत्थान की कोशिश की। 1928 ई. से बनारसी दास चतुर्वेदी जी ने ‘विशाल भारत’ का संपादन किया। भारत के सामाजिक -राजनीतिक जागरण तथा राष्ट्रीय एकीकरण में इस पत्रिका की गंभीर भूमिका रही।

कथा- सम्राट प्रेमचन्द ने 1930 में बनारस से हंस का संपादन किया। साहित्य की विविध विधाओं के प्रकाशन के साथ दलित और स्त्री- चेतना का बीजारोपण इसी पत्रिका में किया गया था। यह अलग सवाल है कि प्रेमचन्द के मरणोपरांत इसका प्रकाशन बंद हो गया। पुन: 1986 ई. में राजेन्द्र यादव ने इसका पुनर्संपादन किया। यह पत्रिका तब से निरंतर निकल रही है।

बहरहाल, हिन्दी पत्रकारिता की संघर्ष-यात्रा आज भी अनवरत जारी है। राज और समाज में जो परिवर्तन हो रहे हैं, हिन्दी पत्रकारिता उसे चित्रित करने का काम करती है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का ‘चतुर्थ स्तंभ’ कहा गया है। यह विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर अपनी पैनी दृष्टि रखती है और उसे निरंकुश होने से बचाती है। आज पत्रकारिता के लिए ‘मीडिया’ शब्द प्रचलित हो गया है और इसके अनेक रूप विकसित हो गये हैं, जैसे- प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सोशल मीडिया आदि। इस बीच जिस तेजी से पत्रकारिता का उत्थान हुआ है, उसी तेजी के साथ इसमें वैचारिता और नैतिकता का ह्रास भी हुआ है। मिशन के रूप में जिस पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी, वह आज मुनाफे का सबसे शानदार कारोबार बन चुका था। सत्ताधारियों की चाटुकारिता उसकी नियति बन गई है। इस प्रकार लोकतंत्र चतुर्थ स्तंभ का ‘गोदी मीडिया’ में कायांतरण हो जाना देश और समाज के लिए सही संकेत नहीं है!

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लेखक, श्री राधा कृष्ण गोयनका महाविद्यालय, सीतामढ़ी, (बिहार) के हिन्दी विभाग में अध्यक्ष हैं।

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