ब्रह्मराक्षस : एक सत्यशोधक की त्रासदी

‘ब्रह्मराक्षस’ मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविताओं में से एक है। ‘अँधेरे में’ नामक कविता के बाद ब्रह्मराक्षस ही सर्वाधिक चर्चित हुई। यह कविता सर्वप्रथम बनारस से प्रकाशित होने वाली लघु पत्रिका ‘कवि’ के अप्रैल, 1957 के अंक में प्रकाशित हुई थी। संभवतः इसका रचनाकाल 1957 ही है। यद्यपि इसमें अन्तिम संशोधन मुक्त्तिबोध ने 1962 ई. में किया। इस कविता के सम्बन्ध में एक खास बात यह है कि जब यह ‘कवि’ पत्रिका में प्रकाशित हुई, तो इसकी ओर पोलिश शोधकर्त्री अग्न्येश्का का ध्यान गया, जिसका उल्लेख मुक्तिबोध सम्बन्धी आलोचना में कई बार मिलता है।

मुक्तिबोध को आत्मसंघर्ष का कवि कहा गया है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि उनमें आत्मसंघर्ष का प्रखरतम रूप मिलता है, तथापि सर्वविदित है कि यह संघर्ष सिर्फ उनका न होकर संपूर्ण मध्यवर्ग का है, जिनमें वे भी शामिल थे। दूसरी बात यह कि उनके आत्मसंघर्ष के अनेक आयाम हैं। ‘ब्रह्मराक्षस’ कविता में आत्मसंघर्ष व्यक्ति और समाज, व्यष्टि और समष्टि तथा तथा भीतर और बाहर के मध्य है। जो हम आगे देखेंगे।

बताते चलें की यह कविता दो खण्डों में विभाजित है। पहले खण्ड में कवि ने ब्रह्मराक्षस के असामान्य व्यवहार का यथातथ्य चित्रण किया है तथा दूसरे खण्ड में उसके आत्मसंघर्ष का चित्रण है। दोनों खण्ड अपने चित्रण की दृष्टि से प्रसंशनीय हैं और अपने भीतर अर्थ की कई-कई परतें समोये हुए हैं। मुक्तिबोध की तमाम कविताएँ गहन चिन्तन से उद्भूत होती हैं, इसलिए उसको समझने के लिए उनकी वैचारिक अवधारणाओं से परिचित होना अपरिहार्य है। यह सत्य है कि उनमें जितनी जटिलता शाब्दिक स्तर पर है, उससे कहीं अधिक वैचारिक स्तर पर है। उनकी सफलता इस बात में है कि वे ज्ञान को सम्वेदना में और सम्वेदना को ज्ञान में रूपान्तरित करने में एक साथ सफल होते हैं।

जैसा कि प्रस्तुत कविता के शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाता है कि इसके केन्द्र में एक ‘ब्रह्मराक्षस’ है। ब्रह्मराक्षस का अर्थ है- ‘ब्रह्म-पिशाच’। शास्त्र के अनुसार- वह ब्राह्मण जो मनुष्य-योनि में पापकर्म करता है, मृत्यु के पश्चात वह प्रेतयोनि को प्राप्त होता है और अंतत: ब्रह्मराक्षस या ब्रह्मपिशाच बन जाता है। इस कविता के ब्रह्मराक्षस का पाप यह था कि वह कर्म से विमुख होकर अपने विचार और कार्य में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाया था। यह उसके मनुष्य-योनि में होने के समय की बात है। स्वभावतः वह मरने के पश्चात मोक्ष प्राप्त करने के बजाय एक प्रेत हो गया।

कविता में ब्रह्मराक्षस के प्रेतोचित व्यवहार का वर्णन करने के पहले मुक्तिबोध ने उसके परिवेश का सम्यक चित्रण किया है। शहर के दूर, जहाँ अनेक मकानों के खण्डहर हैं, एक पुरानी और परित्यक्त बावड़ी है। बावड़ी उस चौड़े कुएँ या छोटे तालाब को कहा जाता है, जहाँ तक पहुँचने के लिए चारों ओर से सीढ़ियाँ बनी होती हैं। इस बावड़ी का जल अत्यन्त गहरा है। उसमें उसकी अनेक सीढ़ियाँ डूबी हुई हैं। जल को थाहा नहीं गया है, परंतु देखने से ही उसकी गहराई का आभास हो जाता है। ठीक वैसे ही जैसे कोई बात समझ में न आ रही हो, लेकिन आभास हो रहा हो कि बात में कोई गहरा अर्थ निहित है। बावड़ी के चारों ओर गूलर के पेड़ खड़े हैं, जिनकी डालें आपस में उलझी हुई हैं। उनकी डालों से उल्लुओं के भूरे और गोल घोंसले लटक रहे हैं। वे भी परिव्यक्त हैं। यानी उनमें उल्लू नहीं बसते। स्पष्ट है कि मन में भय उत्पन्न करने वाली निर्जनता का यह बहुत सटीक चित्रण है। हवा में जंगल की हरी कच्ची गन्ध बसी हुई है। यह गन्ध अनजानी और व्यतीत किसी श्रेष्ठ वस्तु के होने का सन्देह मन में उत्पन्न कर देती है। वह वस्तु भूलती नहीं, हमेशा दिल में एक खटके-सी लगी रहती है। बावड़ी की मुंडेरों पर टगर के सफेद फूल खिले हुए हैं, तारों-जैसे। इस दृश्य का मुक्तिबोध ने बहुत सुन्दर वर्णन किया है :

‘बावड़ी की इन मुंडेरों पर
मनोहर हरी कुहनी टेक
बैठी है टगर
ले पुष्प तारे श्वेत।
उसी के पास लाल कनेर के फूलों का
एक गुच्छा लटक रहा है
यह जैसे खतरे के सिगनल का काम कर रहा है,
क्योंकि उधर बावड़ी का मुँह खुला हुआ है
और आसमान की ओर ताक रहा है।’

इस परिवेश-चित्रण के पश्चात ब्रह्मराक्षस का वर्णन शुरू होता है। वह अभी बावड़ी के गहरे जल में घुसा हुआ है। उसमें डुबकियाँ भी लगाता है, जिससे उसके मुँह की आवाज की अनुगूँज सतह पर सुनाई पड़ती है। साथ-साथ पागलों जैसे उसकी बड़बड़ाहट के शब्द भी। अनुमान होता है कि उसके शरीर पर बहुत गन्दगी जमी है, जिसे दूर करने के लिए वह सदैव नहाता रहता है और अपने पंजों से अपने शरीर के अंगों को लगातार रगड़ता रहता है। मैल फिर भी नहीं छूटता। यहाँ मुक्तिबोध ने कहा है कि बह्मराक्षस ‘पाप-छाया’ से मुक्त होने के लिए निरन्तर स्नान करता है। डॉ० रामविलास शर्मा ने इस पाप को अस्तित्ववादी व्यक्ति के अपराध- बोध से जोड़ा है, जो कि उचित नहीं है। ब्रह्मराक्षस का पाप व्यक्तिगत नहीं है। उसकी समस्या मुख्यत: सामाजिक है। यह समस्या पूरे शिक्षित मध्यवर्ग की है। उसका पाप यह था कि आत्मकेन्द्रित रह कर यानी जनता से जुड़े बगैर उसने अपने को बदलना चाहा। साॅरेन कीर्केगार्द के अनुसार- व्यक्ति के अपराध-बोध से उसका ईश्वर से साक्षात्कार होता है। सर्वश्रेष्ठ हो कि मुक्तिबोध धार्मिक व्यक्ति नहीं थे। कविता में उनका अभिप्राय नितान्त भिन्न है। इसीलिए इसकी अस्तित्ववादी व्याख्या का प्रयास निरर्थक है।

ब्रह्मराक्षस के व्यवहार का वर्णन आगे दूर तक चलता है। वह चूँकि एक बुद्धिजीवी का प्रेत है, इसीलिए नहाते समय वह बेचैनी के साथ कोई अनोखा स्तोत्र अथवा मन्त्र बुदबुदाता है। इतना ही नहीं, उसके मुँह से धाराप्रवाह शुद्ध संस्कृत में गालियाँ निकलती हैं। उसके माथे की लकीरों को देखकर लगता है कि वह लगातार आलोचनात्मक चिंतन की मुद्रा में रहता है। मुक्तिबोध कहते हैं, ‘प्राण में सम्वेदना है स्याह।’ तात्पर्य यह कि ब्रह्मराक्षस के मन में भी कालिमा जमी है। इसी कारण जल में डूबी बावड़ी की दीवारों पर जब सूर्य की किरणें तिरछी गिरती हैं, तो उसे लग‌ता है कि सूर्य ने उसकी श्रेष्ठता स्वीकार कर झुककर उसे नमस्ते किया है। पंक्तियां देखिये :

‘किन्तु गहरी बावड़ी
की भीतरी दीवार पर
तिरछी गिरी रवि-रश्मि
के उड़ते हुए परमाणु जब
तल तक पहुँचते हैं कभी
तब ब्रह्मराक्षस समझता है सूर्य ने
झुक कर नमस्ते कर दिया।’

इसी भाँति बावड़ी की दीवार से जब कभी चाँदनी की किरण अपना रास्ता भूलकर टकराती है तो उसे लगता है कि चाँदनी ने भी उसकी वन्दना की है और उसे ज्ञान-गुरु मान लिया है। यह ऊँचे आकाश का उसके आगे विनत होना था। इस बात को वह रोमांचित हो-होकर महसूस करता था।

उपर्युक्त दृश्य से और उत्तेजित होकर अपनी महानता के प्रति आश्वस्त ब्रह्मराक्षस तमाम इतिहास, दर्शन और विज्ञान की नयी व्याख्या करने लगता था, उस पुरानी बावड़ी के गहरे जल में नहाता हुआ। मुक्तिबोध ने इतिहास, दर्शन आदि का जो जिक्र किया है, उसमें सुमेरी और बेबिलोनी जन-कथाओं तथा वैदिक ऋचाओं से लेकर आज तक के सभी सूत्र, मन्त्र और सिद्धान्त आते हैं। इतिहासकारों, दार्शनिकों, विचारकों और गणितज्ञों में उन्होंने मार्क्स, एंगेल्स, रसेल, टॉयन्बी, हाइडेगर, स्पेंसर, मात्र और महात्मा गाँधी सबको याद किया है। इससे स्पष्ट है कि वह ब्रह्मराक्षस किसी मामूली ब्राह्मण का नहीं, बल्कि बहुत ही विद्वान् ब्राह्मण का प्रेत है। कवि ने ब्रह्मराक्षस को ब्राह्मण परम्परा से लिया है। ब्राह्मण बुद्धिजीवी होता रहा है। यह बुद्धिजीवी विद्वान तो है ही, प्रगतिशील भी है, क्योंकि इसकी मुख्य समस्या का सम्बन्ध समाज के हित में अपने को बदलने से है।

ब्रह्मराक्षस बावड़ी के गहरे जल में डुबकियाँ लगा-लगाकर अत्यधिक उत्साह से विभिन्न दर्शनों और विचारों की अपव्याख्या करता हुआ जब स्नान करता है, तो जल आन्दोलित हो उठता है। उससे आपस में उलझे हुए शब्दों के भँवर बनते हैं, जिनमें प्रत्येक शब्द अपने प्रतिशब्द को भी काटता हुआ प्रतीत होता है। शब्दों का वह रूप अपने बिम्ब से ही जूझता हुआ विकृत आकार ग्रहण करता है। उस बावड़ी में उस समय ध्वनि अपनी प्रतिध्वनि से ही लड़ती दिखलाई पड़ती है। ब्रहाराक्षस उत्साह में है, पर स्वभावतः मानसिक रूप से अतिशय असामान्य अवस्था में। विक्षुब्ध बावड़ी का वर्णन किसी हद तक उसकी मनोदशा को भी झलकाता है। वह वर्णन नीचे उद्धृत किया जा रहा है, क्योंकि वह अत्यन्त सशक्त है :
‘…..ये गरजती, गूँजती आन्दोलित
गहराइयों से उठ रहीं ध्वनियाँ, अतः
उ‌दभ्रांत शब्दों के नये आवर्त में
हर शब्द निज प्रतिशब्द को भी काटता,
वह रूप अपने बिम्ब से ही जूझ
विकृताकार-कृति
है बना रहा
ध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से यहाँ।’

मुक्तिबोध आलोच्य कविता को मार्मिक बनाते हुए कहते हैं कि उस ध्वनि को टगर के फूल, करौंदी के फूल और गूलर के पेड़ सभी सुनते हैं। कवि भी उन्हें सुनता है। वह ध्वनि वस्तुतः एक त्रासदी का प्रतीकात्मक आख्यान है, जो अभी बावड़ी में देखने को मिल रही है। क्या थी वह त्रासदी? यह कि एक सत्यशोधक, जिसे मनुष्य-योनि के बाद प्रेतयोनि प्राप्त हुई, अपने उद्देश्य में बुरी तरह से विफल हुआ।

ब्रह्मराक्षस वस्तुतः सत्यशोधक था। सत्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य-योनि में उसने जो विकट आत्मसंघर्ष किया था, उसका बहुत ही गहन वर्णन कविता के दूसरे खण्ड में है। सर्वप्रथम इसमें मुक्तिबोध ने उसके व्यक्तित्व की कल्पना स्फटिक-निर्मित एक प्रासाद के रूप में की है, जिसमें ऐसी संकीर्ण सीढ़ियाँ बनी हुई थीं, जिन पर चढ़ना बहुत ही दुष्कर था। वे सीढ़ियाँ काली थीं और अँधेरे में डूबी हुईं। उन्होंने जैसे यह स्पष्ट कर दिया है कि ‘व्यक्तित्व वह कोमल स्फटिक प्रासाद-सा’। वैसे ही सीढ़ियों के बारे में यह बतला दिया है कि ‘वे आभ्यन्तर निराले लोक की सीढ़ियाँ थीं। सत्यशोधक उन पर चढ़ता था और उतरता था, फिर चढ़ता था और लुढ़क जाता था। इस कारण उसके पैरों में मोच आ जाती थी और छाती पर अनेक जख्म बन जाते थे। यह उसका आत्मसंघर्ष है, जो उसके भीतर एक पूर्ण व्यक्तित्व की प्राप्ति के लिए निरन्तर चला करता था। पूर्ण व्यक्तित्व की प्राप्ति कैसे सम्भव थी? यह तभी हो पाता, जब वह अपने व्यक्तित्व का पूर्णतया समाजवादी बना लेता। बुरे और अच्छे के बीच का संघर्ष जितना उग्र होता है, उससे अधिक उग्र अच्छे और उससे अधिक अच्छे के बीच का संघर्ष होता है। यहाँ संकेत से मुक्तिबोध ने बतला दिया है कि सत्यशोधक के भीतर सामन्तवादी और पूँजीवादी संस्कारों एवं मूल्यों के बीच नहीं, बल्कि पूँजीवादी और समाजवादी संस्कारों एवं मूल्यों के बीच संघर्ष की स्थिति थी। उसकी गलती यह थी कि वह पूँजीवाद से, अर्थात् व्यक्ति-चेतना से पूर्णतः पिण्ड छुड़ाकर एक शत-प्रतिशत समाजवादी व्यक्तित्व की प्राप्ति करना चाहता था। व्यक्ति चेतना का पूर्णतः निषेध न तो अपेक्षित है, न सम्भव, इसलिए सत्यशोधक को अनिवार्यतः अपने उद्देश्य में सफलता थोड़ी और असफलता अधिक मिली। एक दूसरी बात यह थी कि वह जो भी हासिल करना चाहता था, वह कर्म और व्यवहार के क्षेत्र से दूर रहकर अपने कमरे में बन्द, मात्र अपने चिन्तन के द्वारा। स्वभावतः उसे ज़्यादातर विफलता ही हाथ लगी।

स्पष्ट है कि मुक्तिबोध हर तरह से पूर्ण समाजवादी व्यक्तित्व का लक्ष्य रखने वाले कवि नहीं थे। उनके लिए अपने निजी व्यक्तित्व का बहुत महत्व था, जिसे निश्चय ही वे व्यक्तिवाद से अलग करते थे। लेकिन यदि कोई व्यक्ति हर तरह से पूर्ण समाजवादी व्यक्तित्व को अपना लक्ष्य बनाए और उसके लिए मर्मान्तक मानसिक पीड़ा उठाए तो इसे वे एक बड़ी बात समझते थे। उनका कहना था कि नैतिकता के मानदण्ड गणित की तरह सटीक हों, आत्मचेतन और सूक्ष्म, यह सम्भव नहीं है, फिर भी यदि कोई उनके लिए प्रयत्न करता है और उसमें व्यथा पाता है, तो यह स्पृहणीय है। समाजवादी नैतिकता गणित के नियमों की तरह पूर्ण होती है, इशारा इस मान्यता की तरफ है। उस अतिरेक पर पहुँची हुई नैतिकता की उपलब्धि सदा से कठिन रही है। निम्नलिखित गूढ़ पंक्तियों का आशय यही है –

‘….. अतिरेकवादी पूर्णता
की ये व्यथाएँ बहुत प्यारी हैं….
ज्यामितिक संगति-गणित
की दृष्टि से कृत
भव्य नैतिक मान,
आत्मचेतन सूक्ष्म नैतिक मान
….अतिरेकवादी पूर्णता की तुष्टि करना
कब रहा आसान
मानवी अन्र्तकथाएँ बहुत प्यारी हैं।।’

इस आत्मसंघर्ष में पड़े हुए सत्यशोधक अर्थात् ब्रह्मराक्षस के दिन-रात जब वह मनुष्य-योनि में था बड़ी बेचैनी से कटते थे। दिन में सूर्य निकलता, तो उसे लगता कि चिन्ता की रक्तधारा प्रवाहित हो उठी है और रात में जब चन्द्रमा उदय होता तो उसे महसूस होता कि उसकी किरणें उसके घावों और उद्विग्न भाल पर बंधी हुई सफेद पट्टियाँ हैं। पूरे आकाश पर फैले हुए तारे उसे गणित के दशमलव बिन्दुओं की तरह चारों ओर छितराये नजर आते थे। उन्हीं के मैदान में वह मारा गया। अब उस मैदान में उसकी लाश पड़ी है। मुक्तिबोध के शब्दों में :
‘वक्ष-बाँह खुली
फैलीं एक शोधक की।’

स्पष्टतः यहाँ वे सत्यशोधक के अत्यधिक तीखे आत्मसंघर्ष का वर्णन कर रहे हैं, जो उसके लिए जानलेवा साबित हुआ। ‘शोधक’ शब्द ध्यान देने योग्य है, चूँकि इससे यह संकेत मिलता है कि ब्रह्मराक्षस मनुष्य-योनि में अपने गलत चिन्तन और अकर्मण्यता के कारण अपनी मंजिल न पा सका, लेकिन वह अन्ततः एक नकारात्मक नहीं, बल्कि सकारात्मक चरित्र है। मुक्तिबोध उसकी सीमाओं से परिचित हैं, लेकिन उसके संघर्ष को सहानुभूति ही नहीं, आशंसा के भाव से देखते हैं। पहले जो पंक्ति उद्धृत की गयी है, ‘स्फटिक प्रासाद’ वाली, उसमें उन्होंने उसके व्यक्तित्व को स्पृहा के साथ ‘कोमल’ कहा है।

आगे पुनः वे प्रासाद की सुनसान सीढ़ियों का वर्णन करते हैं, जिन पर चढ़ना बहुत कठिन था और जो ब्रह्मराक्षस के भाग्य में ही बदा था। उसकी समस्या यह थी कि वह चिन्तन और कर्म में सामंजस्य स्थापित न कर सका था। यह कठिन कार्य सबके वश का नहीं है। उसके लिए वही अभिशप्त था। जैसा कि कहा जा चुका है, उसके लिए उसने बहुत प्रयास किया, लेकिन उसे को रास्ता दिखलाने वाला न मिला सो वह अपने उद्देश्य में चूकता रहा। मुक्तिबोध ने लिखा है।

‘उस भाव-तर्क व कार्य-सामंजस्य-योजन
शोध में
सब पण्डित सब चिन्तकों के पास
वह गुरु प्राप्त करने के लिए
भटका॥’

तात्पर्य यह है कि सच्चे ‘गुरु’ की तलाश में वह लगातार भटकता रहा, लेकिन पूँजीवादी युग में उसे गुरु न मिला। पूँजीवादी युग में वह सम्भव भी नहीं था, क्योंकि उसमें किसी को ज्ञान नहीं दिया जाता। गुरु लोग अपने ज्ञान का व्यवसाय करते हैं। उनका ध्यान अपने लाभ के लिए किये गये कार्यों पर रहता है, जिनसे वे धन प्राप्त कर सकें। इस धन में लिप्त मन सत्य का धोखा, अर्थात मरीचिका ही खड़ी कर सकता था। इस तरह सत्यशोधक की खोज पूरी न हुई। इस प्रसंग में मुक्तिबोध की कहानी ‘ब्रह्मराक्षस का शिष्य’ को भी याद किया जा सकता है, जिसमें एक व्यक्ति गुरु की ही तलाश करता हुआ ब्रह्मराक्षस से मिलता है, जो अन्त में उसे यह बतलाता है कि वह इस योनि को इसलिए प्राप्त हुआ कि उसके पास जो ज्ञान था, उसे लोक को अर्पित नहीं किया था, यानी उसे लेकर अपने तक ही सिमटा रहा था।

प्रस्तुत कविता का ब्रह्मराक्षस जब मनुष्य-योनि में था तो आत्मनिष्ठ था, लेकिन उसकी आकांक्षा थी कि वह विश्वनिष्ठ बने। इस कारण उसके भीतर एक बे-बनाव अर्थात् अन्त:संघर्ष की स्थिति बनी रहती थी। वह अपने को लघु समझता था और सार्वजनीनता को ही महान मान कर उसके प्रति समर्पित न होने के कारण मन में हमेशा विषण्ण रहता था। इसके बाद मुक्तिबोध ने जो कुछ कहा है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। खास तौर से हिन्दी की उस प्रगतिशील काव्यधारा के प्रसंग में, जो व्यक्तित्व की लघुता को कोई महत्त्व न देकर उसे समाज के लिए पूर्णतः न्योछावर कर देना चाहती थी। मुक्तिबोध का कथन है:

‘मेरा उसी से उन दिनों होता मिलन यदि
तो व्यथा उसकी स्वयं जी कर
बताता मैं उसे उसका स्वयं का मूल्य उसकी महत्ता।
व उस महत्ता का
हम सरीखों के लिए उपयोग,
उस आन्तरिकता का बताता में महत्व ॥’

इस कथन का एक-एक शब्द बहुमूल्य है, स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य। मुक्तिबोध कहते हैं कि सत्यशोधक की परेशानी बहुत कुछ बेमतलब थी। वह अपने-आप को हीन मान कर जो समाज के चरणों में अपने ‘स्व’ को विसर्जित करना चाहता था, उसकी जरूरत नहीं थी। कारण यह कि समाज के साथ-साथ व्यक्ति की निजता का भी महत्व है। उसके अभाव में व्यक्ति सम्वेदनशील प्राणी न रह कर एक यन्त्र बन जाएगा। इस तरह मध्यवर्ग के जो बुद्धिजीवी अपने व्यक्तित्व से छुटकारा पाने में असमर्थ हैं, उनके लिए यह ज्ञातव्य है कि उनके ‘स्व’, उनके भीतरी जगत और उनकी आन्तरिकता का भी महत्व है। उसे सुरक्षित रखते हुए समाज को समर्पित होना है, न कि उसे त्याग कर। ऐसी स्थिति में सत्यशोधक का भीतर और बाहर के संघर्ष में पड़ कर समाप्त हो जाना एक विकट त्रासदी थी। इस कविता की निम्नलिखित पंक्तियाँ उचित ही बार-बार उद्धृत की गयी हैं:

‘पिस गया वह भीतरी
औ’ बाहरी दो कठिन पाटों बीच,
ऐसी ट्रैजेडी है नीच ॥’

ब्रह्मराक्षस बावड़ी में स्नान करता हुआ लगातार पागलपन-भरे प्रतीकों के माध्यम से अपने दुखद अन्त की ही कहानी कहता रहता है कि किस तरह वह अपने कमरे में ही सारा सोच-विचार करता रहा और अन्ततः समाप्त हो गया। उसका समाप्त होना या मरना किसी सघन झाड़ी के अँधेरे और कटीले कोटर में मरे हुए पक्षी की तरह लुप्त हो जाना था। मुक्तिबोध यहाँ पर दो बातें कहते हैं। एक तो यह कि वह ज्योति अनजानी सदा को सो गयी और दूसरी यह कि यह क्यों हुआ? क्यों यह हुआ? कहा जा चुका है कि सत्यशोधक एक सकारात्मक चरित्र है। इस कारण उसकी अन्तःसंघर्षजनित पीड़ा का भी उन्होंने उपहास नहीं किया है, जिसका प्रमाण यह है कि जहाँ उन्होंने उसे उसके निजी व्यक्तित्व का महत्व बतलाने वाली बात कही है, वहाँ भी कहा है कि ‘व्यथा उसकी स्वयं जी कर’ अर्थात् वे जो भी उसे बतलाते, उसकी तकलीफ का गहराई से एहसास करते हुए। इसी कारण वे उसे अनजानी ज्योति’ कह कर याद करते हैं। अनजानी इसलिए कि सत्यशोधक इस संसार में अलक्षित रह गया। इसके अलावा उनकी चिन्ता यह जानने की है कि वह अपने उद्देश्य में विफल क्यों रहा और उसका अन्त इतना त्रासद क्यों हुआ? कहने की आवश्यकता नहीं कि इसका उत्तर कविता में वे दे चुके हैं। इसके बाद भी यदि वे यह सवाल उठाते हैं, तो इसलिए कि उस पर गम्भीरतापूर्वक पाठक विचार करें।

अन्त में मुक्तिबोध ने बहुत ही मार्मिकता के साथ यह कहा है कि वे उस ब्रह्मराक्षस का शिष्य होना चाहते हैं, उसकी त्रासदी से द्रवित, जिससे कि वह जिस कार्य को अधूरा छोड़ गया है, उसे तर्कसंगत परिणति तक पहुँचा सकें। उसकी वेदना का स्रोत उसका अधूरा कार्य या उद्देश्य ही है। उसी से वह हमेशा बेचैन बना रहता है और असामान्य व्यवहार करता है। निष्कर्ष यह कि मुक्तिबोध की आकांक्षा अपनी निजता को सुरक्षित रखते हुए कर्म-क्षेत्र में उतर कर अपने व्यक्तित्व के सामाजिक रूपान्तरण की है।

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