मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ : एक समीक्षा
गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ सामाजिक चेतना के सशक्त कवि हैं। उन्हें मार्क्सवादी खाँचे में कैद कर नहीं रखा जा सकता। मानव-मुक्ति ही उनका प्रधान संकल्प है। हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ आलोचक डॉ० रामविलास शर्मा तथा डॉ० नामवर सिंह के परस्पर विरोधी विचारों के कारण ‘अँधेरे में’ नामक कविता को अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। एक ही खेमे के लोग दो खेमों में विभाजित हो गये। इन दोनों खेमों से अलग रहकर अनेक तटस्थ समीक्षक मुक्तिबोध को मानवतावादी मानते हैं। सही मायने में इस महान् कवि को किसी एक वाद, सिद्धान्त अथवा विचारधारा तक सीमित नहीं माना जा सकता। अतः कवि मुक्तिबोध को जनवादी, मार्क्सवादी की अपेक्षा व्यापक अर्थवत्ता का रचनाकार मानना न्यायसंगत होगा। मुक्तिबोध का दृष्टिकोण मानवतावादी है। मानव के शाश्वत मूल्यों की व्याख्या ही उनकी कविताओं प्रमुख उद्देश्य है।
‘अँधेरे में’ नामक कविता प्रथमत: 1964 ई. में जबलपुर से निकलने वाली ‘कल्पना’ पत्रिका में ‘आशंका के द्वीप अंधेरे में’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस कविता को अनेक समीक्षकों ने भिन्न-भिन्न विशेषणों से रूपायित किया है। यथा- ‘अँधेरे में परम अभिव्यक्ति को खोज’, ‘अँधेरे में युग की सर्वश्रेष्ठ कविता’,’अंधेरे में मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष’ आदि-आदि।
‘अँधेरे में’ अत्यन्त प्रदीर्घ कविता है। अँधेरे में पूरी मानव सभ्यता डूबी हुई है। मुक्तिबोध महावाराह की भाँति अँधेरे रूपी धरती का उद्धार करना चाहते हैं। इस कविता में उसकी इच्छा, डर, आतंक, मूल्य, बदलाव आदि का ब्योरेवार समावेश है। आरंभ में एक ‘रक्तालोक स्नात पुरुष’ दिखाई पड़ता है। यह उसके विभाजित व्यक्तित्व का सकारात्मक अंश है। अन्य कविताओं में भी वह अक्सर दिखाई पड़ जाता है। दूसरे बन्द में वही ‘मैं’ को बाहर आने के लिए सॉकले बजाकर आहूत करता है। यही ‘वह’- ‘मैं’ में गुरु-शिष्य सम्बन्ध स्थापित होता है। तीसरे बन्द में संगीन नोकों के साथ चमकते जंगल का डरावना जुलूस है। चौथे में मुक्तिबोध का चिर-परिचित जीना (सीढी) है। पाँचवाँ बन्द दीप्ति वलयित रत्नों से लबालब भरा है। छठे में जनता का भविष्य है। सातवें में अभिव्यक्ति खतरे का उल्लेख है और आठवें में युवकों का व्यक्तित्वांतरण होता है और आत्मसंभवा परम अभिव्यक्ति की उपलब्धि ।
वास्तव में इस कविता में न तो अस्मिता की खोज है और न अस्तित्ववाद- रहस्यवाद की वैचारिक अभिव्यक्ति। इसमें अँधेरे के विरुद्ध प्रकाश का अनवरत संघर्ष है। इसी संघर्ष में ही उसकी अपनी रचना-प्रक्रिया-आत्मसंभवा परम अभिव्यक्ति होती है। रचना आत्मसंभवा ही हो सकती है। लेकिन उसकी रचना सिद्धावस्था की नहीं, साधनावस्था की है। अतः उसे अपने अन्तर्विरोधों की पड़ताल करनी पड़ती है। उसे डरावने जुलूस का सामना करना पड़ता है। उस जुलूस का, जो ‘संगीन नोकों का चमकता जंगल’ है। इसमें कर्नल, बिग्रेडियर, आलोचक, विचारक, कवि तथा शहर का कुख्यात हत्यारा डोमाजी उस्ताद भी सम्मिलित हैं। डोमा उस्ताद के साथ आलोचक, विचारक और कवि की कलई भी पोंछ दी गयी है। कवि प्रश्न उठाता है-
‘अब तक क्या किया ?/ जीवन क्या जिया !!!
मुक्तिबोध की रचना और जीवन इसका उत्तर है। उसकी रचना-प्रक्रिया को भी इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए। बुद्धिजीवी वर्ग से उसे कोई आशा नहीं है। इसीलिए वे कहते हैं
-‘बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास/किराये के विचारों का उद्भास।’
पर जनता उसके साथ है। इन अनुभवों को वह दीप्ति वलयित, संवेदनात्मक और विवेकयुक्त बनाता है। वह अनुभव कर रहा है कि युवकों का व्यक्तित्वांतरण होता जा रहा है। व्यक्तित्वांतरण के बाद सही कविता-पक्षधर कविता-स्वतः उद्भूत हो उठती है। एक लंबी साधना और अव्याहत प्रक्रिया के बाद परम अभिव्यक्ति प्राप्त होती है।
मुक्तिबोध वस्तु और रूप में पार्थक्य नहीं मानते। अतः रूप पर पूरा ध्यान देते हैं। आत्मसंघर्ष को रूपायित करने के लिए आत्मालाप की शैली अपनाना आवश्यक था। किसी कविता में बाहर और अन्दर के वैविध्य, अन्तर्विरोध, बिखराव को फंतासी के माध्यम से ही एक सूत्र में पिरोया जा सकता था। आत्मालाप का नाट्य-विधान ‘मोनोलाग’ से मिलता-जुलता है।
प्रतीक-विधान एकदम देशी है। बरगद, पीपल, खंडहर, बावली, ब्रह्मराक्षस, बियाबान, जंगल, पठार, फणिघर आदि को चुनने में उन्होंने अपने को पिटी हुई परंपरा से अलग किया है। पर इन प्रतीकों का दोष यह है कि वे अपनी पुनरावृत्तियों में ऊब पैदा करते हैं। कविता एकरस हो जाती है। प्रश्न होता है कि उन्होंने सारी कविताएँ एक ही ढंग की क्यों लिखीं ? न प्रकृति-चित्रण, न श्रृंगारिक काव्य । इससे उनके जटिल अन्तर्द्वन्द्व की थाह लगायी जा सकती है।