# आँखिन देखी > डॉ. उमेश कुमार शर्मा ## Posts - [हिन्दी गद्य के विकास में फोर्ट विलियम काॅलेज की भूमिका](https://aankhindekhi.com/524-2/): फोर्ट विलियम काॅलेज की स्थापना लार्ड बेलेजली के समय (सन् 1800 ई०) में हुई। बेलेजली ने भारत आकर यह अनुभव किया कि कम्पनी के कर्मचारी केवल एक व्यापारिक संस्था के कर्मचारी नहीं, बल्कि अब एक सरकार के अधिकारी हैं। उनमें शिक्षा, जनभाषा- ज्ञान और सदाचरण की आवश्यकता है। अतः उनकी शिक्षा-दीक्षा के लिए जाॅन गिल क्राइस्ट की अध्यक्षता में उन्होंने ‘ओरियंटल सैमिनरी की स्थापना की। बाद में यही संस्था फोर्ट विलियम काॅलेज के रूप में परिवर्तित हुई और गिलक्राइस्ट उसके हिन्दुस्तानी विभाग के अध्यक्ष नियुक्त किये गये। कालेज में गिलक्राइस्ट साहब ने हिन्दुस्तानी के नाम पर उर्दू को ही प्रोत्साहन […] - [ब्रह्मराक्षस : एक सत्यशोधक की त्रासदी](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%b8-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%a7/): ‘ब्रह्मराक्षस’ मुक्तिबोध की प्रसिद्ध कविताओं में से एक है। ‘अँधेरे में’ नामक कविता के बाद ब्रह्मराक्षस ही सर्वाधिक चर्चित हुई। यह कविता सर्वप्रथम बनारस से प्रकाशित होने वाली लघु पत्रिका ‘कवि’ के अप्रैल, 1957 के अंक में प्रकाशित हुई थी। संभवतः इसका रचनाकाल 1957 ही है। यद्यपि इसमें अन्तिम संशोधन मुक्त्तिबोध ने 1962 ई. में किया। इस कविता के सम्बन्ध में एक खास बात यह है कि जब यह ‘कवि’ पत्रिका में प्रकाशित हुई, तो इसकी ओर पोलिश शोधकर्त्री अग्न्येश्का का ध्यान गया, जिसका उल्लेख मुक्तिबोध सम्बन्धी आलोचना में कई बार मिलता है। मुक्तिबोध को आत्मसंघर्ष का कवि कहा गया […] - [हिन्दी पत्रकारिता की संघर्ष यात्रा](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98/): हिन्दी पत्रकारिता की संघर्ष-यात्रा – डाॅ. उमेश कुमार शर्मा भारत में हिन्दी पत्रकारिता का उद्भव सामाजिक राजनीतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक क्रांति के गर्भ से हुआ है। इस क्षेत्र में आने वाले लोग पत्रकारिता को पेशे के रूप में नहीं, अपितु मिशन के रूप में अपनाया। राज और समाज के प्रति देशवासियों में परिवर्तनकामी चेतना का प्रसार इसका केन्द्रीय उद्देश्य था। इसलिए प्रसिद्ध शायर अकबर इलाहाबादी ने ठीक ही कहा है – “खीचो न कमानों को, न तलवार निकालो। जब तोप मुकाबिल हो, अखबार निकालो।।” भारत में हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत वस्तुत: ‘उदंत मार्तण्ड’ से मानी जाती है। इसका प्रकाशन युगल […] - [गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' : एक समीक्षात्मक अध्ययन](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%97%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%b5-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%a7-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95-2/): गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ सामाजिक चेतना के सशक्त कवि हैं। उन्हें मार्क्सवादी खाँचे में कैद कर नहीं रखा जा सकता। मानव-मुक्ति ही उनका प्रधान संकल्प है। हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ आलोचक डॉ० रामविलास शर्मा तथा डॉ० नामवर सिंह के परस्पर विरोधी विचारों के कारण ‘अँधेरे में’ नामक कविता को अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। एक ही खेमे के लोग दो खेमों में विभाजित हो गये। इन दोनों खेमों से अलग रहकर अनेक तटस्थ समीक्षक मुक्तिबोध को मानवतावादी मानते हैं। सही मायने में इस महान् कवि को किसी एक वाद, सिद्धान्त अथवा विचारधारा तक सीमित नहीं माना जा सकता। अतः कवि मुक्तिबोध को जनवादी, […] - [गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' एक समीक्षात्मक अध्ययन](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%97%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%b5-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%a7-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95/): मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ : एक समीक्षा गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ सामाजिक चेतना के सशक्त कवि हैं। उन्हें मार्क्सवादी खाँचे में कैद कर नहीं रखा जा सकता। मानव-मुक्ति ही उनका प्रधान संकल्प है। हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ आलोचक डॉ० रामविलास शर्मा तथा डॉ० नामवर सिंह के परस्पर विरोधी विचारों के कारण ‘अँधेरे में’ नामक कविता को अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। एक ही खेमे के लोग दो खेमों में विभाजित हो गये। इन दोनों खेमों से अलग रहकर अनेक तटस्थ समीक्षक मुक्तिबोध को मानवतावादी मानते हैं। सही मायने में इस महान् कवि को किसी एक वाद, सिद्धान्त अथवा विचारधारा तक सीमित नहीं […] - [हिन्दी : काम भी और नाम भी](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%ad%e0%a5%80-2/): प्रिय पाठकों! लोग अक्सर पूछते हैं कि आज दुनिया कहाँ से कहाँ चली गयी है! लोग चाँद और मंगल ग्रह पर बस रहे हैं। वैज्ञानिक आविष्कारों ने चमत्कृत कर दिया है। विज्ञान ने संसार के सारे रहस्यों का उद्भेदन कर दिया है। इस जमाने में लोग अंग्रेजी पढ़कर बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं। पैसा कमा रहे हैं! नाम कमा रहे हैं। ऐसे में हिन्दी पढ़े-लिखे को कौन पूछता है?……..जब काम ही नहीं मिलेगा तो लोग हिन्दी पढ़कर क्या करेंगे? सच पूछा जाय तो यह सवाल ही गलत है। यह कहना कि अंग्रेजी पढ़कर वे लोग सफल हो […] - [सूरदास के भ्रमरगीत की अंतर्वस्तु](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a4%97%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4/): हिन्दी साहित्य में ‘भ्रमरगीत-प्रसंग’ उद्धव-गोपी संवाद से सम्बन्धित रचनाओं के लिए प्रचलित है। ऐसी काव्य रचनाएँ, जिनमें उद्धव एवं गोपियों के संवाद की योजना करते हुए ज्ञान एवं योग का खण्डन तथा प्रेम और भक्ति का मण्डन किया जाता है- ‘भ्रमरगीत’ के नाम से जानी जाती हैं। इस श्रृंखला की कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं -सूरदास का ‘भ्रमरगीत-प्रसंग’, नन्ददास का ‘भंवरगीत’, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का ‘प्रियप्रवास’, जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ का ‘उद्धव शतक’ एवं सत्यनारायण कविरल का ‘भ्रमरदूत’। यद्यपि इन सभी रचनाओं के कथानकों में भिन्नता है, तथापि अपने कथ्य के कारण वे भ्रमरगीत-परम्परा की रचनाओं में परिगणित हैं। उद्धव-गोपी संवाद का मूल […] - [अस्मितामूलक विमर्श और हाशिए का समाज](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b2%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%be-2/): बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में वैश्विक फलक पर उदारीकरण, भूमंडलीकरण और बाजारवाद का तेजी से विस्तार हुआ तो इसका व्यापक असर भारत पर भी पड़ा। 1990 के आसपास भारत में कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं। यथा- बाबरी मस्जिद विध्वंस, नक्सलवाद का उदय, मंडल कमीशन का गठन आदि। इन घटनाओं ने भारत की सामाजिक राजनीतिक संरचना में आमूलचूल परिवर्तन हुआ। इसी के प्रभाव स्वरूप हाशिए के समाज-स्त्री, दलित और आदिवासी का प्रतिरोधी स्वर भी मुखरित हुआ। पिछले कुछ दशकों में हिन्दी उपन्यास का केन्द्रीय स्तर यही अस्मितावादी विमर्श रहा है। आलोचक वीरेन्द्र यादव हाशिए के समाज को केन्द्रित कर किये […] - [अस्मितामूलक विमर्श और हाशिए का समाज](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b2%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%be/): अस्मितामूलक विमर्श और हाशिए का समाज बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में वैश्विक फलक पर उदारीकरण, भूमंडलीकरण और बाजारवाद का तेजी से विस्तार हुआ तो इसका व्यापक असर भारत पर भी पड़ा। 1990 के आसपास भारत में कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं। यथा- बाबरी मस्जिद विध्वंस, नक्सलवाद का उदय, मंडल कमीशन का गठन आदि। इन घटनाओं ने भारत की सामाजिक राजनीतिक संरचना में आमूलचूल परिवर्तन हुआ। इसी के प्रभाव स्वरूप हाशिए के समाज-स्त्री, दलित और आदिवासी का प्रतिरोधी स्वर भी मुखरित हुआ। पिछले कुछ दशकों में हिन्दी उपन्यास का केन्द्रीय स्तर यही अस्मितावादी विमर्श रहा है। आलोचक वीरेन्द्र यादव हाशिए […] - [गूगल की अंधी दौर में गुरु](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%97%e0%a5%82%e0%a4%97%e0%a4%b2-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81/): ‘अप्प दीपो भव’ अर्थात् ‘अपना दीपक स्वयं बनो।’ महात्मा बुद्ध के इस सूक्ति वाक्य की अक्सर गलत व्याख्या कर दी गई। दरअसल, कोई भी शिष्य अपना दीपक स्वयं को तभी बना सकता है, जब उसके अंतस में किसी सदगुरु ने ज्ञान का लौ जला दिया हो। ‘अप्प दीप भव’ दीक्षांत के समय का सार्थक वाक्य है। कोई गुरु दीक्षा पूर्ण होने के पश्चात ही शिष्य को उसका दीपक स्वयं बनने की बात कह सकता है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि यह वाक्य सिद्धार्थ नहीं ‘तथागत’ (जो सिद्धि प्राप्त कर चुका हो) ने कहा था। अतएव, यह सूक्ति वाक्य गुरु की […] - [कुंवर नारायण की कविताओं में मिथकीय चेतना](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%95%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%ae/): हिन्दी के नये कवियों में कुंवर नारायण का नाम अत्यन्त सम्मान से लिया जाता है। पांचवें दशक में प्रकाशित होने वाली प्रमुख साहित्यिक पत्रिका ‘युग-चेतना’ का सम्पादन करते हुए कुंवर नारायण साहित्य जगत में चर्चित रहे। इसके अतिरिक्त इन्होंने ‘आजकल’, ‘नया प्रतीक’ तथा ‘छायानट’ आदि पत्रिकाओं के सम्पादन से भी संबद्ध रहे हैं। कुंवर नारायण की कविताएँ अज्ञेय द्वारा सम्पादित ‘तीसरा सप्तक’ में संकलित हैं। इसके अतिरिक्त उनकी अन्य रचनाएँ हैं-‘चक्रव्यूह’, ‘परिवेश हम तुम’, ‘आत्मजयी’, ‘अपने सामने’, ‘कोई दूसरा नहीं’ इत्यादि। कवि कुंवर नारायण ने चेकोस्लोवाकिया, पोलैण्ड, रूस एवं चीन का भ्रमण किया, जिसने इनकी विचारधारा को बहुत अधिक प्रभावित […] - [मुक्तिबोध की कविताओं में फैंटेसी](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%a7-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%93%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/): प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के बीच से अपने मार्ग संधान करने वाले कवि मुक्तिबोध ने मानव-जीवन की जटिल संवेदनाओं और उसके अन्तर्द्वन्द्वों की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति के लिए ‘फैंटेसियों’ का कलात्मक प्रयोग किया है। ‘फैंटेसी’ में कल्पनाओं और विचारों की परतें एक के बाद एक ‘खुलती चली जाती हैं और कवि की मानसिक उर्वरता का सही बोध पाठकों के समक्ष उपस्थित होता है। ‘फैंटेसी’ शब्द का निर्माण यूनानी शब्द ‘फैंटेसिया’ से हुआ है, जिसका अर्थ है- ‘मनुष्य की वह क्षमता, जो संभाव्य संसार की सर्जना करती है।’ मुक्तिबोध के अनुसार “फैंटेसी मन की निगूढ़ वृत्तियों का, अनुभूत जीवन वृत्तियों का, इच्छित विश्वासों […] - [अस्मितामूलक विमर्श : अर्थ, स्वरूप और सिद्धांत](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%b2%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6-%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5/): ‘अस्मिता’ शब्द संस्कृत भाषा के ‘अस्मिन’ से बना है। इसमें मूल धातु है- ‘अस्मि’, जिसका अर्थ है- ‘मैं हूँ’। इस प्रकार अस्मिता का अर्थ होगा- ‘स्वयं के होने का बोध’। हिन्दी शब्दकोश के अनुसार अस्मिता का अर्थ है- ‘आत्मश्लाघा’, ‘मोह, ‘अहंकार’, ‘अपनी सत्ता का भाव’, ‘आपा’ इत्यादि। ‘अस्मिता’ का सीधा संबंध व्यक्ति के पहचान से है। इस पहचान के अनेक आयाम हैं। इसमें नाम, जाति, लिंग, वंश, धर्म, वर्ग, क्षेत्र, राष्ट्र, व्यवसाय आदि सम्मिलित होते हैं। अर्थात् अस्मिता व्यक्तिगत भी हो सकती है और सामूहिक भी। हिन्दी के प्रख्यात साहित्यकार राजेन्द्र यादव ‘अस्मिता’ के संबंध में कहते हैं- “‘अस्मिता’ जितनी […] - [बाणभट्ट की आत्मकथा : एक समीक्षा](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a3%e0%a4%ad%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%9f-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%80/): आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी (1907-1979 ई.) हिन्दी के ऐसे ऐतिहासिक उपन्यासकार हैं, जिनके उपन्यास इतिहास के तथ्यों पर उतने आधारित नहीं हैं, जितने ऐतिहासिक वातावरण एवं देशकाल पर आधारित हैं, जिसकी सृष्टि उन्होंने अपनी अद्भुत कल्पना-शक्ति से की है। उनके लिखे चारों उपन्यास इसी प्रकार के हैं। उन उपन्यासों के नाम हैं- ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ (1946 ई.), ‘चारुचन्द्र लेख’ (1963 ई.), ‘पुनर्नवा’ (1973 ई.) एवं ‘अनामदास का पोथा’ (1976 ई.)। द्विवेदी जी का प्रथम उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ में सातवीं शती के भारत की राजनीतिक स्थिति का निरूपण हुआ है। उस समय उत्तर भारत पर हूणों का आक्रमण हुआ था और […] - [मैला आँचल : वस्तु और शिल्प](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%81%e0%a4%9a%e0%a4%b2-%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%81-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%aa/): ‘मैला आँचल’ हिन्दी के चर्चित कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु रचित आंचलिक उपन्यास है, जिसका प्रकाशन सन् 1954 ई, में हुआ। ‘मैला आँचल’ में बिहार के पूर्णिया जिले के मेरीगंज गाँव को कथा के केन्द्र में रखा गया है। यह गाँव तैराहट स्टेशन से सात कोस पूरब स्थित है। गाँव के पूरब में कमला नदी की धारा सतत प्रवाहित हो रही है। बरसात के अतिरिक्त अन्य दिनों में यह धारा प्राय: सूख जाती है और रेत के गड्‌ढों में जगह-जगह जल-कुण्ड बन जाते हैं। गाँव के सांस्कृतिक जीवन के साथ नदी का गहरा अंतर्संबंध है। ‘मेरीगंज’ नाम नील की खेती करने वाले […] - [शेखर : एक जीवनी का कथा-शिल्प](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b6%e0%a5%87%e0%a4%96%e0%a4%b0-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%8d%e0%a4%aa/): ‘शेखर एक जीवनी’ ससच्चिदानंद हीरानंद वावात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का बहुचर्चित उपन्यास है, जिसके दो भाग प्रकाशित हुए हैं। प्रथम भाग का प्रकाशन सन् 1941 ई. में और द्वितीय भाग का प्रकाशन सन् 1944 ई. में हुआ। यह अज्ञेय की ऐसी औपन्यासिक रचना है, जिसे जीवनी प्रधान मनोवैज्ञानिक उपन्यास कहना अधिक उचित होगा। स्वयं अज्ञेय के अनुसार, ” ‘शेखर एक जीवनी’ एक अधूरी जीवनी है, जो घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए ‘विजन’ को शब्दबद्ध करने का प्रयत्न है।” इस उपन्यास का तीसरा भाग भी अज्ञेय जी ने लिखा था, पर वे उसमें कुछ संशोधन करना चाहते थे, जो […] - [गोदान : ग्रामीण जीवन और कृषि संस्कृति का महाकाव्यात्मक उपन्यास](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%95-%e0%a4%89/): ‘गोदान’ प्रेमचंद रचित एक वृहद् औपन्यासिक कृति है, जिसका वर्ण्य विषय अत्यन्त व्यापक है। इस व्यापकता को ध्यान में रखकर इसे ग्रामीण जीवन और कृषि संस्कृति का महाकाव्य कहा गया है। महाकाव्यात्मक उपन्यास उस उपन्यास को कहा जाता है, जिसका फलक अत्यंत व्यापक हो, चरित्र सृष्टि श्रेष्ठ कोटि की हो, विविध विषयों का निरूपण हो, उद्देश्य महत्त्वपूर्ण हो और जो जीवन से गहरा सरोकार रखता हो। महाकवि गेटे ने उपन्यास को ‘आत्मपरक महाकाव्य’ की संज्ञा दी है, तो राल्फ फॉक्स ने उपन्यास को आधुनिक बुर्जुआ समाज का महाकाव्य कहा है। डॉ. सत्यपाल चुघ का मत है कि, “महाकाव्य ‘रसवादी’ होते […] - [गोदान : कृषक जीवन की त्रासदी](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a4%95-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a4%a6/): ‘गोदान’ कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचन्द द्वारा लिखा गया वह औपन्यासिक कृति है, जिसे कृषक जीवन का महाकाव्य कहा गया है। इस उपन्यास की रचना 1935 ई. में की गई थी। गोदान से पूर्व प्रेमचन्द ‘प्रेमाश्रम’ की रचना कर चुके थे, जिसमें जमींदारों द्वारा किसानों के शोषण का उल्लेख था। ‘प्रेमाश्रम’ को गोदान की पूर्वपीठिका कहा जा सकता है। प्रेमचन्द के लेखन का सरोकार ग्रामीण जीवन विशेषकर कृषक वर्ग से था। वे उनकी पीड़ा, शोषण, कठिनाइयों से भली-भाँति परिचित थे और चाहते थे कि जमींदारी-प्रथा समाप्त हो जो किसानों के शोषण के लिए बहुत कुछ उत्तरदायी थी। अपने एक आलेख में प्रेमचन्द […] - [गोदान : शीर्षक की सार्थकता](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%b6%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7%e0%a4%95-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be/): कथा-सम्राट प्रेमचंद द्वारा रचित उपन्यास ‘गोदान’ हिन्दी उपन्यासों में शीर्षस्थ है। अपनी सहज प्रवाहपूर्ण शैली, रोचक कथावस्तु, उदात्त मानवीय मूल्यों, यथार्थ एवं आदर्श के मणिकांचन संयोग के कारण पाठकों के एक विराट वर्ग से इसे सराहना प्राप्त होती रही है। प्रेमचंद ने इस महाकाव्यात्मक उपन्यास के माध्यम से भारतीय समाज का यथार्थ चित्र अंकित किया है। ‘गोदान’ भारतीय कृषक की संघर्ष भरी दास्तान को शब्दों में बांधने का सफलतम प्रयास है। यह किसानी जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है। इसे 1930 और 1940 के दशक के उत्तर भारत का साहित्यिक इतिहास कहें, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। औपन्यासिक तत्त्वों के […] - [देवसेना : प्रसाद-साहित्य की उदात्त कल्पना](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b5%e0%a4%b8%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95/): देवसेना प्रसाद साहित्य की सर्वोत्तम कल्पना है। ‘स्कन्दगुप्त’ नाटक में यद्यपि यह कल्पित स्त्री- पात्र है, परंतु नाटककार ने उन्हें इस रूप में प्रस्तुत किया है कि वह सर्वथा ऐतिहासिक लगती है। इसी के बहाने नाटक में तलवार की टंकार के साथ पायल की झंकार भी सुनाती देती है। वह प्रलय के वक्त भी गीत गाकर एक तरह से नियति के विधान को चुनौती देती है। ‘स्कन्दगुप्त’ में बन्धुवर्मा की बहन, मालव की राजकुमारी देवसेना के चरित्र का निर्माण प्रसाद की अमर कल्पना से हुआ है। उनमें आदर्श नारी-चरित्र के सभी गुण, यथा- सहनशीलता, उदारता, भावुकता, गंभीरता, देश-प्रेम, संगीतप्रियता, प्रेमानुभूति […] - [स्कन्दगुप्त : प्रसाद-साहित्य का उदात्त चरित्र](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf/): जयशंकर प्रसाद हिन्दी के चर्चित नाटककार हैं। उन्होंने अनेक ऐतिहासिक और पौराणिक नाटकों का सृजन किया। प्रसाद जी को सर्वाधिक सफलता ऐतिहासिक नाटकों के सृजन में मिली है। वह भारत के गौरवमयी अतीत को अपनी मौलिक प्रतिभा से प्राणवान और सरस बना दिया है। अक्सर इतिहास और ऐतिहासिक संदर्भ पाठकों को लिए नीरस माना जाता है, परंतु प्रसाद जी ने इतिहास और कल्पना का मणिकांचन संयोग कर, उसे बेहद रोचक बना दिया है। उन्होंने सर्वत्र संभाव्य कल्पना की योजना की है। उनकी कल्पना वायवीयता की सीमा से परे है। ‘स्कन्दगुप्त’ नाटक का काल (275 ई. से 540 ई.) अतीतकालीन भारत […] - [स्कन्दगुप्त : एक विहंगावलोकन](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2/): स्कंदगुप्त : एक विहंगावलोकन डॉ. उमेश कुमार शर्मा हिन्दी नाट्य लेखन परंपरा का प्रवर्तन भारतेन्दु- युग में हुआ, परंतु इस विधा को सृजनात्मक उत्कर्ष प्रसाद-युग में प्राप्त हुआ। जयशंकर प्रसाद ने पौराणिक, ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ को आधार बनाकर कुल बारह नाटकों की रचना कीं। यथा-‘सज्जन'(1910 ई.), ‘करुणालय’ (1913 ई.), ‘प्रायश्चित'(1913 ई,), ‘राजश्री’ (1914 ई,), ‘विशाख'(1921 ई,),’अजातशत्रु'(1922 ई,), ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ (1926 ई,),’कामना’ (1927 ई.), ‘स्कंदगुप्त'(1928 ई.), ‘एक घूंट'(1929 ई.), ‘चन्द्रगुप्त'(1931 ई.) और ‘ध्रुवस्वामिनी'(1933 ई.)। अपने ऐतिहासिक नाटकों में प्रसादजी ने भारत के गौरवमयी अतीत को केंद्र में रखते हुए वर्तमान की समस्याओं को उजागर किया है। प्रसादकृत नाटक ‘स्कन्दगुप्त’ […] - [स्कंदगुप्त : एक विहंगावलोकन](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%a4-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%8b/): हिन्दी नाट्य लेखन परंपरा का प्रवर्तन भारतेन्दु- युग में हुआ, परंतु इस विधा को सृजनात्मक उत्कर्ष प्रसाद-युग में प्राप्त हुआ। जयशंकर प्रसाद ने पौराणिक, ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ को आधार बनाकर कुल बारह नाटकों की रचना कीं। यथा-‘सज्जन'(1910 ई.), ‘करुणालय’ (1913 ई.), ‘प्रायश्चित'(1913 ई,), ‘राजश्री’ (1914 ई,), ‘विशाख'(1921 ई,),’अजातशत्रु'(1922 ई,), ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ (1926 ई,),’कामना’ (1927 ई.), ‘स्कंदगुप्त'(1928 ई.), ‘एक घूंट'(1929 ई.), ‘चन्द्रगुप्त'(1931 ई.) और ‘ध्रुवस्वामिनी'(1933 ई.)। अपने ऐतिहासिक नाटकों में प्रसादजी ने भारत के गौरवमयी अतीत को केंद्र में रखते हुए वर्तमान की समस्याओं को उजागर किया है। प्रसादकृत नाटक ‘स्कन्दगुप्त’ 1928 ई० में प्रकाशित हुआ। यह वही दौर […] - [अधेर नगरी का कथ्य और उद्देश्य](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%85%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%97%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%89%e0%a4%a6%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%87/): ‘अंधेर नगरी’ की रचना भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने सन् 1881 ई. में की,जिसे ‘प्रहसन’ माना गया है। इसके अन्तर्गत छह छोटे-छोटे अंक हैं, जिन्हें नाटक के छह दृश्य कहा जा सकता है। यह एक व्यंग्यात्मक रचना है, जिसमें विनोदपूर्ण शैली में कुशासन के दुष्परिणामों को रेखांकित किया गया है। ऐसा राजा! जिसके शासनकाल में कोई व्यवस्था न हो, जहाँ न्याय-अन्याय में भेद न किया जाता हो, अच्छे-बुरे में कोई अन्तर न होता हो, निश्चय ही ‘चौपट राजा’ है और उसकी नगरी ‘अन्धेर नगरी’ है। इस प्रहसन के प्रथम अंक में एक महन्त अपने दो शिष्यों- गोवर्धनदास एवं नारायणदास के साथ भजन […] - [जयशंकर प्रसाद रचित नाटक 'ध्रुवस्वामिनी' का प्रतिपाद्य](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%9c%e0%a4%af%e0%a4%b6%e0%a4%82%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%b0%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%9f%e0%a4%95-%e0%a4%a7/): बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न साहित्यकार जयशंकर प्रसाद ने अपनी मौलिक कृतियों से हिन्दी साहित्य की अनेक विधाओं को समृद्ध किया है। क्या गद्य! क्या पद्य! वे जिसे भी छू देते हैं, वह उनकी अलौकिक प्रज्ञा से चमत्कृत हो उठता है। यही कारण है कि वे जितने श्रेष्ठ कवि हैं, उतने ही कुशल गद्यकार भी। गद्यकार के रूप में उन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानी तथा निबंध का सृजन किया है। नि:संदेह उन्हें नाटककार के रूप में सर्वाधिक सफलता मिली है। वे हिन्दी के युगप्रवर्तक नाटककार माने जाते हैं। उन्होंने भारत के गौरवमयी अतीत को अपने नाटकों का विषय बनाया है तथा नाटकों […] - [दलित-विमर्श और हिन्दी कथा साहित्य](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be/): इधर कुछ दशकों से ‘दलित विमर्श’ की चर्चा साहित्य के केन्द्र में है। दलित का अर्थ है- समाज का दबा-कुचला (अर्थात् शोषित) वर्ग, किन्तु इसका अभिधेयार्थ ‘अनुसूचित जाति’ के लिए रूढ़ होकर रह गया है। इसलिए ‘दलित चेतना’ का तात्पर्य अनुसूचित जाति के व्यक्तियों में अन्याय, शोषण, वर्ग-भेद, जाति भेद के विरुद्ध उत्पन्न आक्रोश से लिया जाता है। इसी का दूसरा नाम ‘दलित-विमर्श’ है, जिसे कुछ कथा लेखकों ने अपनी कहानियों तथा उपन्यासों का प्रमुख विषय बनाया है। सच्चाई यह है कि दलित वर्ग के अन्तर्गत केवल ‘अछूत’ कहे जाने वाले अनुसूचित जाति के लोग ही नहीं आते, अपितु शोषण […] - [भक्ति-आंदोलन की पृष्ठभूमि](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%ad%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%86%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a5%8b%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%a0%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%ae/): आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल की समय सीमा 1375 वि. से 1700 वि. (1318-1643 ई.) तक मानी है। भक्ति का सर्वप्रथम प्रयोग ‘श्वेताश्वतर उपनिषद्’ में मिलता है। दक्षिण भारत में आलवार भक्तों की परम्परा सातवीं शती से चली आ रही थी। ‘आलवार’ भक्त वैष्णवों का तमिल नाम है। शैवों को वहाँ ‘नायनमार’ कहा जाता है। आलवार वैसे भक्त थे, जो अपनी आत्मिक प्रेरणा सें भक्ति में लीन हुए। बंगाल में इस तरह के भक्त ‘बाऊल’ (अर्थात ईश्वर की भक्ति में बावला) कहलाए। आलवारों ने आध्यात्मिक विचार वेद, उपनिषद् एवं गीता से ग्रहण किए। लेकिन ये लोग अपने […] - [राम की शक्ति पूजा : आत्मिक जागरण की कविता](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9c%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%9c/):            हिन्दी साहित्य में अत्यंत चर्चित ‘राम की शक्ति पूजा’ (1936) निराला द्वारा रचित एक लम्बी कविता है, जो उनके काव्य संकलन ‘अनामिका’ में संकलित है। 312 पंक्तियों की इस कविता की कथा जितना पौराणिक है, उतना ही ऐतिहासिक और समसामायिक भी। यह कविता निराला ही नहीं, संपूर्ण छायावाद की सृजनात्मकता का उत्कर्ष है। कवि ने धर्म और अधर्म के शाश्वत संघर्ष का मार्मिक चित्रण किया है। इसमें राम ‘धर्म’ के प्रतीक हैं और रावण ‘अधर्म’ का। इस कविता में अधर्म का चित्रण एक प्रचंड शक्ति के रूप में हुआ है, जिसके समक्ष राम जैसे धीर- […] - [कैसे साकार होगा विकसित भारत का स्वप्न](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a4%be-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%ad%e0%a4%be/): यह बहुत ही सुखद है कि आजादी के सौ वर्ष पूरे होने तक (अर्थात 1947 तक) भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया गया है। ‘गाँधी के सपनो का भारत’ जैसे शब्द-युग्म अब अर्थहीन प्रतीत हो रहे थे। ऐसे में ‘विकसित भारत का स्वप्न’ जैसे शब्द-युग्म मन में कौतूहल पैदा करता है। जातिवाद, वर्गवाद, सम्प्रदायवाद के साथ ही बाजारवाद और आतंकवाद जैसी समस्याओं से जूझते हुए विकसित भारत का स्वप्न देखना कितना सुखद लगता है! यह भारत की आम जनता को यह उसी प्रकार रोमांचित करता है, जिस प्रकार गुलामी के दौरान आजादी के सुनहरे सपने रोमांचित कर रहे […] - [अकाल में उत्सव : कृषक जीवन की त्रासदी](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%85%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%89%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b8%e0%a4%b5-%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%b7%e0%a4%95-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%95/): प्रेमचंद रचित महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘गोदान’ के पश्चात कृषकों के त्रासद जीवन की अभिव्यक्ति पंकज सुबीर रचित उपन्यास ‘अकाल में उत्सव’ में हुई है। यह उपन्यास शिवना प्रकाशन, नई दिल्ली से 2016 ई. में प्रकाशित हुआ। उपन्यास को पढ़ते हुए लगा कि एक लंबे अंतराल के बाद कृषक जीवन पर इतना यथार्थपूर्ण लेखन किया गया। इस उपन्यास में ‘गोदान’ की ही भाँति दो समानांतर कथाएँ चलती रहती हैं। एक कथा गाँव की और दूसरी शहर की। कथा के उत्तरार्द्ध में लेखक ने दोनों कथाओं का एक मेहराव तैयार कर पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर दिया है। उपन्यास को पढ़ते हुए कभी […] - [कफन : व्यक्ति- स्वातंत्र्य की अभिव्यक्ति](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%95%e0%a4%ab%e0%a4%a8-%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%bf-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af/): हिन्दी कहानी लेखन- परंपरा में सबसे अधिक चर्चित, लोकप्रिय एवं विवादास्पद कहानी के रूप में ‘कफन’ की चर्चा की जाती है। एक ओर तो कथ्य और शिल्प की दृष्टि से इसे हिन्दी की श्रेष्ठ कहानी कहते हैं, दूसरी ओर आलोचकों का एक ऐसा समूह भी है, जो इसे श्रेष्ठ कहानी मानने का पक्षधर नहीं है। इस कहानी पर तरह- तरह से विचार किया गया है। कुछ आलोचकों ने इसे दलित दंश की अभिव्यक्ति कहा है, तो कुछ के लिए यह तद्युगीन सामाजिक-आर्थिक कुव्यवस्था से उत्पन्न निठल्लेपन की अभिव्यक्ति है। कोई इस कहानी को दलित विरोधी मानते हैं, तो कोई स्त्री-विरोधी। […] - [गणतंत्र होने का निहितार्थ](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%97%e0%a4%a3%e0%a4%a4%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d/): इसमें कोई संदेह नहीं कि इस बार भी हम सभी ‘गणतंत्र’ का निहितार्थ समझे बिना बेहद जोश और उत्साह के साथ ‘गणतंत्र दिवस’ समारोहपूर्वक मनाएंगे। राष्ट्रगान गाएंगे। और साथ ही एड़ियाँ उठा- उठाकर ‘भारत माता की जय’ और ‘बंदे मातरम’ के साथ ही ‘महात्मा गाँधी अमर रहे’, ‘सुभाषचंद्र बोस अमर रहे’, ‘जवाहरलाल नेहरू अमर रहे’, ‘भगत सिंह अमर रहे’….आदि नारे लगाएंगे, परंतु बिडम्बना यह है कि देश की अधिसंख्य जनता आजादी के 78 सालों बाद भी देश के गणतंत्र होने का मतलब नहीं समझ पाई है। वह बस इतना समझते हैं कि आजादी के पश्चात 26 जनवरी, 1950 को हमारा […] - [भूमंडलीकरण के दौर में समाजवादी विचार](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a5%8c%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be/): ‘भूमंडलीकरण’ अंग्रेजी के ‘ग्लोबलाइजेशन’ का हिन्दी पर्याय है, जिसके लिए विश्वग्राम, वैश्वीकरण आदि शब्द भी प्रयुक्त होते हैं। किसी व्यक्ति, वस्तु, विचार या भाव को क्षेत्रीय सीमा से उठाकर संपूर्ण भूमंडल में फैला देना ही भूमंडलीकरण है। आज भूमंडलीकरण के दौर में जब हमारे समाज पर बाजारवाद हावी है। लोग तमाम चीजों को नफे और नुकसान की कसौटी पर परख रहे हैं, पारिवारिक एवं सामाजिक रिश्तों में तनावपूर्ण स्थिति बनी है। लोग अपने निजी स्वार्थ को सिद्ध करने को व्याकुल हैं। रिश्तों की गर्माहट खत्म हो रही है और मनुष्य एकाकीपन के शिकार हो रहे हैं, ऐसे में समाजवादी विचार […] - [राजभाषा हिन्दी की संघर्ष- यात्रा](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%98%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b7/): उर्दू के प्रसिद्ध शायर इकबाल ने सत्य ही कहा है- ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी….!’ यह कुछ बात है- ‘भारत की सामासिक संस्कृति’, ‘अनेकता में एकता’ और ‘विरुद्धों का सामंजस्य…!’ वास्तव में भारत की समृद्ध संस्कृति सामासिक है! यह अनेक जातियों, वर्गों, धर्मों, संप्रदायों, लिंगों, नस्लों की परस्पर टकराहट और सम्मिलन से निर्मित हुई है। यही गुण यहाँ की भाषा में भी अंतर्निहित है। भारत की राष्ट्रभाषा ‘हिन्दी’ भी एक सामासिक शब्द है, जो किसी खास भाषा का नाम नहीं, बल्कि अनेक छोटी- बड़ी भाषाओं और बोलियों का समुच्चय है। हमें सदैव ध्यान रखना चाहिए कि हिन्दी […] - [असाध्य वीणा : गहन आत्मचिंतन की कविता](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%85%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%a3%e0%a4%be-%e0%a4%97%e0%a4%b9%e0%a4%a8-%e0%a4%86%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a4/): असाध्य वीणा : गहन आत्मचिंतन की कविता – डाॅ. उमेश कुमार शर्मा प्रयोगवाद के प्रवर्तक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय एक प्रतिभासंपन्न कवि हैं। उनकी कविताएँ अंग्रेजी कवि विलियम वर्ड्सवर्थ, टी. एस. इलियट और आई. ए. रिचर्ड्स की भाँति गहन आत्मचिंतन से प्रस्फुटित होती हैं। विलियम वर्ड्सवर्थ के शब्दों में कहें तो अज्ञेय की कविताएँ ‘प्रबल मनोवेगों का सहज उच्छलन है।’ समय से कदमताल करती हुई उनकी कविताएँ पाठक को ‘स्पोण्टेनियस’ के चरम तक ले जाती हैं। ‘चिन्ता’, ‘इत्यलम’, ‘भग्नदूत’, ‘हरी घास पर क्षण भर’, ‘अरी ओ करुणा प्रभामय’, ‘बाबरा अहेरी’, ‘इन्द्रधनुष रौंदे हुए’, ‘कितनी नावों में कितनी बार’, ‘आंगन के […] - [अंतर्नाद : समय से संवाद करती गजलें](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a4/): हिन्दी, अंग्रेजी और बंगला के गंभीर अध्येता, कवि और गजलकार श्री शिवशंकर सिंह के गजल-संग्रह ‘अंतर्नाद’ को पढ़‌कर आश्वस्ति हुई कि दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, निदा फाजली आदि की प्रगतिशील धारा अवरुद्ध नहीं हुई है। ‘अंतर्नाद’ में केवल परंपरा की पुनरावृत्ति नहीं है, नवोन्मेष की प्रस्तावना भी है। अंतर्नाद परंपरा और वैयक्तिक प्रज्ञा की संयुक्त अभिव्यक्ति है। इस संग्रह की सबसे बड़ी खासियत है- ‘अंतर्वस्तु का वैविध्य’। इसमें जीवन के संयोग-वियोग के साथ ही भारतीय स्वाधीनता के बाद उत्पन्न मोहभंग की स्थिति, बेवसी, निरुपायता, राजनीतिक छल-छद्म, अपराध की राजनीतिकरण, राजनीति का अपराधीकरण, साम्प्रदायिक द्वेष आदि मानवीय संकटों की मार्मिक अभिव्यक्ति […] - [दलित संत-साहित्य और भारतीय ज्ञान-परंपरा](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80/): भारतवर्ष विद्वानों, पंडितों, संतों और मनीषियों का देश है। यहाँ की ज्ञान- परंपरा सर्वाधिक पुरातन और व्यापक है। भारतीय ग्रंथ ‘ऋग्वेद’ न केवल भारत, बल्कि संसार का सबसे प्रचीन ग्रंथ है। भारतीय ज्ञान- परंपरा की शुरुआत वहीं से हो जाती है। चारों वेदों के साथ ही ब्राह्मण-ग्रंथों, उपनिषदों, आरण्यक ग्रंथों तथा पुरानों ने भारतीय ज्ञान- परंपरा को समृद्ध किया है। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसे आर्ष महाकाव्यों का सृजन भारत में ही हुआ। अतएव,हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि भारत के पास एक समृद्ध ज्ञान- परंपरा है। बौद्ध-साहित्य और जैन-साहित्य इसी परंपरा की अगली कड़ी है, जो कालांतर में […] - [आभासी तिलस्म में फँसी वर्तमान पीढ़ी](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%86%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ab%e0%a4%81%e0%a4%b8%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d/): “पापा! रात हो गई। अब छत पर नहीं रहना चाहिए….नीचे चलिए।” मेरे चार वर्षीय बेटे ने डरते हुए मुझसे कहा। -“क्यों, ऐसा क्या हो गया सो…!” मैंने पूछा। -“रात को न, छत पर ‘स्नोमेन’ आ जाता है। वह बहुत खतरनाक है। वह बच्चों को मारकर खा जाता है और बड़ों को टांग पकड़कर घसीटते हुए ले जाता है। उसका एक भाई भी है। वह भी बहुत खतरनाक है।” बोलते हुए उसकी साँसें तेज हो गयी….। एक अज्ञात भय उसके चेहरे पर उभर आया। -“लेकिन तुमने कहाँ देखा स्नोमैन…?” मैंने प्रश्न किया। -“मोबाईल में….! -“मोबाईल में स्नोमेन! दिखाओ तो मुझे भी…।” […] - [मां पर नहीं बन पाती है कोई कविता](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%82-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%ac%e0%a4%a8-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%95/): संसार का हर भाव समा जाता है मेरे शब्दों में नदी, नाले, पेड़, पहाड़…धरती का फैलाव…….. समुद्र की अनंत गहराई…… प्रकृति की हर विराटता अट जाती है शब्दों में। मैं किसी भी अनुभूति में भर देता हूँ रंग, चाहे वह अपनी हो या परायी, पर मौन हो जाते हैं मेरे शब्द जब ‘माँ’ पर सोचने लगता हूँ शब्द जैसे चूने लगते हैं मन से भावों की धारा में बह जाता है शब्द इधर-उधर और मैं उदास……..बार-बार उसे समेटने की कोशिश करता हूँ, पर शब्दों से नहीं बना पाता हूँ ‘माँ’ मेरी हर कोशिश नाकाम हो जाती है ‘माँ’ पर नहीं […] - [राजमहल](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%b2-2/): राजमहल वह नहीं, जहाँ पर प्रतिक्षण हो रंग-रलियाँ। जहाँ वासना की बजती हो, नयी- नयी पैजनियाँ ।। बालाओ के अरुण अधर का होता हो नित चुम्बन। नई-नवेली कलियों का ही होता हो अभिनंदन।। सठे न मदिरा और पियक्कड़, थके नटी का नर्तन। और मेनका नृत्य करें, करके नि:वस्त्र अपना तन।। नहीं-नहीं वह जहाँ, नित्य ही खेला जाए पाशा। साँझ- सबेरे जहाँ षोडशी का ही लगे तमाशा।। उड़े जहाँ नित ही गुलछर्रे, रोज जहाँ हो होली। नई यौवना का ही फारी जाए क्षण-क्षण चोली।। करे गुलाब सलिल से नित ही तन का मज्जन रानी। मधुर सेज पर ही पहुंचे, पीने तक […] - [राजमहल](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%b2/): काव्य : राजमहल राजमहल वह नहीं, जहाँ पर प्रतिक्षण हो रंग-रलियाँ। जहाँ वासना की बजती हो, नयी- नयी पैजनियाँ ।। बालाओ के अरुण अधर का होता हो नित चुम्बन। नई-नवेली कलियों का ही होता हो अभिनंदन।। सठे न मदिरा और पियक्कड़, थके नटी का नर्तन। और मेनका नृत्य करें, करके नि:वस्त्र अपना तन।। नहीं-नहीं वह जहाँ, नित्य ही खेला जाए पाशा। साँझ- सबेरे जहाँ षोडशी का ही लगे तमाशा।। उड़े जहाँ नित ही गुलछर्रे, रोज जहाँ हो होली। नई यौवना का ही फारी जाए क्षण-क्षण चोली।। करे गुलाब सलिल से नित ही तन का मज्जन रानी। मधुर सेज पर ही […] - [राजभाषा हिन्दी : दशा और दिशा](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a4%b6%e0%a4%be-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b6/): उर्दू के प्रसिद्ध शायर इकबाल ने सत्य ही कहा है- ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी….!’ यह कुछ बात है ‘भारत की सामासिक संस्कृति’, ‘अनेकता में एकता’ और ‘विरुद्धों का सामंजस्य…!’ वास्तव में भारत की संस्कृति सामासिक है! यह अनेक जातियों, वर्गों, धर्मों, संप्रदायों, लिंगों, नस्लों की परस्पर टकराहट और सम्मिलन से निर्मित हुई है। यही गुण यहाँ की भाषा में भी अंतर्निहित है। भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी भी एक सामासिक शब्द है, जो किसी खास भाषा का नाम नहीं, बल्कि अनेक छोटी- बड़ी भाषाओं का समुच्चय है। हमें सदैव ध्यान रखना चाहिए कि हिन्दी केवल खड़ीबोली का […] - [शोध-सार  : न्यू मीडिया की अवधारणा ](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b6%e0%a5%8b%e0%a4%a7-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%82-%e0%a4%ae%e0%a5%80%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%b5/):  ‘मीडिया’ शब्द मीडियम से बना है, जिसका अर्थ है- ‘माध्यम’। ‘मीडिया’ व्यक्ति का समाज तथा सत्ता से संवाद का स्थापित करने का माध्यम है। परंपरागत रूपों में मीडिया के दो रूप-प्रिंट मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। प्रिंट मीडिया मे प्रमुखत: अखबार तथा पत्र-पत्रिकाओं को स्थान दिया जाता है,जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में रेडियो,टेलीविजन, मोबाइल, इंटरनेट आदि की गणना की जाती है। न्यू मीडिया की अवधारणा       ‘न्यू मीडिया’ शब्द वस्तुत: सोशल मीडिया के लिए  प्रयुक्त होता है। इस न्यू मीडिया ने सूचना और संचार- क्रांति कई अभिनव प्रयोग किए हैं। न्यू मीडिया ने अब हर आदमी को पत्रकार बना दिया है। इससे […] - [भूमंडलीकरण और गांधीवाद](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a3-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6/): ‘भूमंडलीकरण’ को अंग्रेजी में ‘ग्लोबलाइजेशन’ कहा जाता है, जिसके लिए ‘वैश्वीकरण’, ‘विश्ववाद’ तथा ‘बाजारवाद’ आदि शब्द का प्रयोग किया जाता है। भूमंडलीकरण का अर्थ है किसी भी वस्तु, व्यक्ति या विचार को स्थान विशेष से उठाकर समूचे विश्व में फैला देना। भूमंडलीकरण वस्तुत: वैश्विक उदारीकरण की उपज है, जिसने बाजारवाद को बढ़ावा दिया है। भूमंडलीकरण एक उत्कृष्ट शब्द है, जिसे बाजारवाद ने दूषित कर दिया है। बाजारवाद ने तमाम चीजों के प्रति नफे और नुकसान का भाव विकसित कर दिया है। अब प्रत्येक वस्तु या विचार को बाजार की कसौटी पर परखा जाता है। ऐसे में समाज और देश ही […] - [दलित साहित्य का समकालीन संदर्भ](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%b8/): समकालीनता के इस दौर में दलित-विमर्श के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है, चूँकि समकालीन विमर्शों में सबसे ज्वलंत और धारदार विमर्श के रूप में स्थापित दलित -विमर्श में एक तरह की जड़ता आ गई है। दलित साहित्य का बदले की भावना से लिखा जाना उसके लिए हितकर नहीं है। आज समाज का स्वरूप बदल गया है। वर्ण-व्यवस्था की नींव पर स्थापित भारतीय समाज का ढाँचा बहुत कुछ बदल गया है ।आज दलितों की मूल समस्या ब्राह्मणवाद नहीं, बल्कि शिक्षावाद, सत्तावाद और पूँजीवाद की कोख से उत्पन्न नव-ब्राह्मणवाद है। वैसे भी पूंजीवाद और बाजारवाद ने जातिवाद की बुनियाद हिलाकर रख दिया है, […] - [हमें लड़ना है....](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b2%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88/): हमें लड़ना है उस सत्ता के खिलाफ  जो हमारे खिलाफ साजिश में सरीक है हमें लड़ना है उनके खिलाफ  जो हमारे हिस्से की रोटी-पानी से खेलता है हमें लड़ना है उनके खिलाफ  जिसने हमारे हिस्से की हवाओं को कैद कर लिया है हमें लड़ना है उनके खिलाफ  जो धर्म और कर्म के नाम पर हमें बाँटता है हमें लड़ना है उनके खिलाफ  जो सच बोलने पर हमें डाटता है हमें लड़ना है उनके खिलाफ, क्योंकि लड़ना हमारी नियति है। - [अच्छे दिन कब आएंगे....](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%85%e0%a4%9a%e0%a5%8d%e0%a4%9b%e0%a5%87-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%ac-%e0%a4%86%e0%a4%8f%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87/): अच्छे दिन कब आएंगे…. पूछ रही रही है भूखी जनता अच्छे दिन कब आएंगे? रोजी होगी, रोटी होगी दो वक्त सब खाएंगे…. पूछ रही है भूखी जनता अच्छे दिन कब आएंगे? बच्चे रोटी मांग रहे हैं कहाँ से लाएँ, किससे मांगे सब भूखे मर जाएंगे… पूछ रही है भूखी जनता  अच्छे दिन कब आएंगे? सभी पढ़ेंगे, सभी बढ़ेंगे नेताजी का वादा था स्कूल-कॉलेज बेच रहे हैं उनका यही इरादा था संविधान भी बदलेंगे ये ऐसा कानून लाएंगे पूछ रही है भूखी जनता अच्छे दिन कब आएंगे? हर हाथ को काम मिलेगा और पूरा सम्मान मिलेगा अच्छे दिन हैं आने वाले […] - [धरती और स्त्री](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%a7%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80/): किसी ने ठीक ही कहा है… धरती है स्त्री……… उतनी ही सहनशील  ममतामयी, जन्मदात्रीपालनकर्त्री…………. स्त्री, सबकुछ सहकर घूमती ही रहती है दाम्पत्य की धूरी पर निरापद…..! निर्लिप्त……!! निस्पंद…….!!! - [देह शाश्वत है](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b9-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%88/): था मैंने, -आत्माएँ अमर हैं देह मरता है बार-बार, लेकिन अब लगता है, -आत्माएँ मर रही हैं,  और देह शास्वत है…… अट्टालिकाओं में रहती हैं प्रेतात्माएं…… - [स्वर्ग से घसीट लाएंगे बच्चे..](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%98%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%9f-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a5%8d-2/):  रह जाने दो थोड़ी-सी हवा कि कल सांस ले सकेंगे बच्चे रहने दो थोड़ा-सा साफ पानी कि प्यास बुझा सकेंगे बच्चे बची रहने दो थोड़ी-सी जमीन, ताकि फसल उगा सकेंगे बच्चे बच जाने दो थोड़ी-सी सभ्यता कि नया समाज बना सकेंगे बच्चे नहीं तो एक दिन ऐसा भी आएगा स्वर्ग से घसीट लाएंगे तुम्हें, तुम्हारे बच्चे और तुम अपने ही बनाए नरक में पाए जाओगे! ।डाॅ. उमेश कुमार शर्मा - [कथनी और करनी](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%a8%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a5%80/):           “यह संसार नश्वर है। ‘दृश्य जगत’ माया का प्रसार है। सारे नाते -रिश्ते केवल भ्रम हैं। यहाँ कोई किसी का नहीं है…..!”          महंथ रामतीर्थ दास का यह प्रवचन सुनकर कई लोग विरक्त हो गये!          कई संन्यासी हो गये।          कई गृह-त्यागी…….।          परंतु रामतीर्थ दास दान में मिली हुई धोती की कीमत आँकते हुए परेशान हो रहे थे-‘आजकल भक्तों को भी किफायत सूझने लगी है।’                                  […] - [स्वर्ग से घसीट लाएंगे बच्चे](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%97-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%98%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%9f-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%8f%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a5%8d/):  बच जाने दो थोड़ी-सी हवा  कि कल सांस ले सकेंगे बच्चे रहने दो थोड़ा-सा साफ पानी कि प्यास बुझा सकेंगे बच्चे बची रहने दो थोड़ी-सी जमीन, ताकि फसल उगा सकेंगे बच्चे बच जाने दो थोड़ी-सी सभ्यता कि नया समाज बना सकेंगे बच्चे नहीं तो एक दिन ऐसा भी आएगा स्वर्ग से घसीट लाएंगे तुम्हें, तुम्हारे बच्चे  और तुम अपने ही बनाए नरक में पाए जाओगे। डाॅ. उमेश कुमार शर्मा - [पूर्ण आजादी](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a3-%e0%a4%86%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80/):            -“मम्मा! आज के दिन हमलोग ‘गणतंत्र दिवस’ क्यों मनाते हैं?” हाथ में तिरंगा लिए प्रभात फेरी में जाने से पहले पाँच साल के यश ने प्रश्न किया।         -“बेटा!आज के दिन ही हमें पूर्ण आजादी……”           -“चुप! तूँ जानती है आजादी के बारे में…?” माँ बोल ही रही थी कि पिता ने उसे डाॅट दिया।         -“तो ठीक है पापा, आप ही बता दीजिए!” उसने फिर पूछा।          -“बेटा! हमारा देश 15 अगस्त, 1947 को ही आजाद हो गया था, लेकिन हमारा संविधान आज के […] - [](https://aankhindekhi.com/331-2/):           “यह संसार नश्वर है। ‘दृश्य जगत’ माया का प्रसार है। सारे नाते -रिश्ते केवल भ्रम हैं। यहाँ कोई किसी का नहीं है…..!”          महंथ रामतीर्थ दास का यह प्रवचन सुनकर कई लोग विरक्त हो गये!          कई संन्यासी हो गये।          कई गृह-त्यागी…….।          परंतु रामतीर्थ दास दान में मिली हुई धोती की कीमत आँकते हुए परेशान हो रहे थे-‘आजकल भक्तों को भी किफायत सूझने लगी है।’                                  […] - [हिन्दी दिवस](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b8/): “शुभ प्रभात मम्मा….!” सुबह आँखें खुलते ही  चार साल की निक्की ने अपनी माँ का अभिवादन किया।           “शुभ प्रभात नहीं बोलते बेटा….मम्मा को गुड मार्निंग बोलते हैं।” माँ ने उसे दुलारते हुए सिखाया।           “लेकिन कल तो आपने ‘गुड मार्निंग’ कहने पर डाॅट दिया था मुझे…..!” निक्की ने हैरत से पूछा।          “वो क्या है न बेटा, कि कल ‘हिन्दी दिवस’ था……!”             माँ ने उसे प्यार से समझा दिया….। - [डायरी का अंतिम लाईन](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%ae-%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%88%e0%a4%a8/): बैंक अधिकारी विनय वर्मा को आज का सूरज कुछ नया लग रहा था। आज वृक्ष कुछ अधिक हरे लग रहे थे। चिड़ियों की चहचहाहट भी कितना हृदय- स्पर्शी प्रतीत रहा था। प्रकृति अधिक रम्य और नीरव…..! क्यों न हो! यह 2024 का सूरज है। उन्हें चारों ओर सबकुछ नया ही नजर आ रहा था। नया साल….नयी नौकरी… नयी पत्नी…..किराये का नया मकान….नया सोफा….नया बेड…नयी आलमारी…..नये गमले और गमले में खिले गुलाब भी नयेपन से झूम रहे थे….!           मोबाइल पर मध्यरात्रि से ही नव -वर्ष की बधाईयाँ और शुभकामनाएँ मिल रही थीं। प्रात: भ्रमण से लौटते ही […] - [गुरुमंत्र](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%b0%e0%a5%81%e0%a4%ae%e0%a4%82%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/):             उस दिन मेरा मन कुछ अशांत था! मैं अपने वयोवृद्ध गुरुदेव डाॅ. वर्मा के घर पहुँचा कि यहाँ कुछ शांति मिले! गुरुदेव मुझे देखकर प्रसन्न हुए। शायद कुछ समय के लिए उनका अकेलापन दूर हो जाएगा। उन्होंने आशीष देते हुए मुझसे पूछा,”आजकल क्या सब चल रहा है! पढ़ाई – लिखाई हो रही है अच्छे से!”           -“जी गुरुदेव! सब ठीक चल रहा है। पढ़ाई- लिखाई हो रही है।” मैंने बिना कुछ सोचे जवाब दिया।           -“क्या नया लिख रहे हो अभी?”           -“एक उपन्यास पर काम कर रहा हूँ गुरुदेव! उच्च शिक्षा में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर […] - [समकालीन समाज की चुनौतियाँ और गांधीवाद की प्रासंगिकता।](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a5%8c%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be/): भारतीय समाज अनेक जातियों, प्रजातियों, वर्गों, समुदायों, धर्मों, संप्रदायों का समुच्चय है। भारतीय संस्कृति की असली सामासिकता समाज में ही दृष्टिगत होती है। अनेकता में एकता तथा विषमता में समता का संदेश देने वाला भारतीय समाज संसार के समक्ष सर्वोत्तम उदाहरण है। लेकिन वर्तमान समय में भूमंडलीकरण और बाजारवाद के कारण उत्पन्न उपभोक्तावादी संस्कृति ने भारतीय सामाज की शुचिता को ध्वस्त कर दिया है। ‘अर्थ’ के पीछे आँखें बंद कर भागने की प्रवृत्ति ने नैतिकता के तमाम मानदंडों को तार-तार कर डाला है। विकास की अंधी दौर में हम सबने अपना ही जड़ खोद डाला है, जिसकी परिणति को अनेक […] - [गांधी का समाजवाद](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6/): आधुनिक भारत के निर्माण में महात्मा गाँधी के दर्शन तथा उनके समाजवादी विचारों की महत्ता सर्वोपरि है। महात्मा गाँधी ने किसी मौलिक दर्शन का प्रवर्तन नहीं किया, बल्कि उन्होंने भारतीय धर्म तथा संस्कृति के उत्तमांशों को एकत्रित कर, उसे प्रयोगात्मक स्तर पर जीवन में उतारने का सफल प्रयत्न किया है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य तो पहले से ही सभी धर्मों के मूल में स्थित था। जिन्हें गाँधीवादी जीवन- दर्शन के रूप में देखा जाता है। गाँधीजी बखूबी जानते थे कि समाज में विभेद या विषमता का मूल कारण है- धार्मिक कट्टरता तथा आर्थिक साधनों-संसाधनों  का अनुचित वितरण। इतिहास साक्षी […] - [कोउ नृप होय हमै का हानि.....](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%89-%e0%a4%a8%e0%a5%83%e0%a4%aa-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%af-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%88-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%bf/): मध्यकाल के युगद्रष्टा कवि गोस्वामी तुलसीदास रचित ‘रामचरितमानस’ की प्रसिद्ध पंक्ति- ‘कोउ नृप हो, हमै का हानि…..’ में मंथरा के बहाने शासन और सत्ता से त्रस्त आम जनता की आह शब्दबद्ध हुआ है। यह वही दौर था, जब राजा और प्रजा का संबंध विच्छेद हो चुका था। राजा अपने निजी सुख- सुविधाओं को भोगने तथा साम्राज्य विस्तार में तल्लीन था तो आम जनता रोजी- रोटी के संकट से जूझ रही थी। इतिहास साक्षी है कि भारत पर बार-बार विदेशी आक्रान्ताओं का अधिपत्य होने के पीछे भी यही कारण था कि तत्कालीन राजा से उनके प्रजा के संबंध अच्छे नहीं थे। […] - [झूठा है महावृत्तांत](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%9d%e0%a5%82%e0%a4%a0%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%a4/): झूठा है महावृत्तांत! झूठी हैं, सब कहानियाँ कुंठित है हमारा इतिहास और पुराण, क्योंकि सत्य को अक्सर छिपाया है सबने जिस सीता ने बाएँ हाथ से उठाया था शिव-धनुष जिस पर प्रत्यंचा चढ़ाने में पस्त हो गये थे शूरवीर उसे यूँ ही नहीं उठा पाया होगा रावण वह लड़ी होगी, शक्ति भर अन्याय के खिलाफ  और अंततः वह छल से हारी होगी, जैसे आज भी छल से हार रही हैं सीता….! यज्ञकुंड से उद्भूत द्रौपदी का यूँ ही नहीं हुआ होगा चीरहरण वह दमभर लड़ी होगी, असत्य के खिलाफ  और तब हारी होगी, जब अपनों ने छला होगा उसे जैसे […] - [साहित्य और समाज](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c/): साहित्य और समाज के अंतर्संबंध तथा पारस्परिक निर्भरता को लेकर विद्वानों में सदा से विवाद रहा है। ‘साहित्य समाज का दर्पण है’ यह कथन साहित्य के अध्येताओं के लिए लगभग ‘तकिया कलाम’ बन गया है। यह कितना सत्य है बिना विचारे ही प्रयोग किये जा रहे हैं। यह सर्वविदित है कि समाज और साहित्य का गहरा अंतर्संबंध है। समाज के परे साहित्य की कल्पना संभव नहीं है। दोनों की परस्पर निर्भरता भी निर्विवाद है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस पर अपना मंतव्य देते हुए कहा है- “जबकि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृतियों का संचित प्रतिबिंब होता […] - [साहित्य और समाजशास्त्र](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/): यह सर्वविदित है कि साहित्य और समाज का गहरा अंतर्संबंध है। प्रत्येक समाज का अपना साहित्य है और प्रत्येक साहित्य का अपना समाज। इसीलिए आज साहित्य का समाजशास्त्र एक विधा के रूप में विकसित हो रहा है। साहित्य के सृजनात्मक वैयक्तिकता पर सामाजिकता हावी है। यह सत्य ही है कि साहित्य जितना वैयक्तिक है, उससे अधिक सामाजिक। चूँकि किसी भी साहित्यकार पर उसके सामाजिक परिवेश का प्रभाव अनिवार्य रूप से पड़ता है। ऐसे में बिना समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के हम किसी भी साहित्य अथवा साहित्यकार का सम्यक् मूल्यांकन नहीं कर सकते। समाजशास्त्र अनिवार्य रूप से समाज में स्थित मनुष्य का वैज्ञानिक […] - [साहित्य का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af/): ‘साहित्य का समाजशास्त्र’ एक विधा के रूप में विकसित हो गया है, जिसमें साहित्य और समाज के अंतर्संबंधों का अध्ययन किया जाता है। इस विधा में साहित्य के अध्ययन की विधियाँ, नाटकीय प्रस्तुति, रचनाकारों और पाठकों की सामाजिक और वर्गीय स्थिति शामिल है। साहित्य के समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण को मुख्यत: दो रूपों में समझा जा सकता है। इसमें लोकप्रिय और परंपरागत दृष्टिकोण के अनुसार साहित्य को ‘समाज का दर्पण’ माना गया है। साहित्य का ‘दर्पण -बिम्ब’ वाला दृष्टिकोण साहित्य को एक सामाजिक दस्तावेज मानता है। इसके अनुसार साहित्य सामाजिक संरचना के विभिन्न पक्षों, संबंधों, प्रवृत्तियों, संघर्षों यानी समाज की बनावट और […] - [भूखे भजन न होई....](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%96%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%9c%e0%a4%a8-%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%88/): सत्तनाम!…..सत्तनाम! की रट लगाते हुए वह एक हाथ में कमंडल और दूसरे में सुमरनी लिए तेज कदमों से चला जा रहा था। जवाहर दास के भजन का आलाप उसे चुम्बक की भाँति खींच रहा था- कौने ठगवा नगरिया के लूटल हो…..कौने ठगवा! देर हो गयी! माया- मोह के बंधनों को काटना कितना मुश्किल है। वह घर -गृहस्थी से मुक्त होता तो वह भी संत प्रदुमन दास के साथ रमता जोगी बहता पानी……… धरमदास ढोलक पर गिरगिरी दे रहा था।अब धरमदास जैसा ढोलकिया कोई नहीं हो सकता! रतन दास का कान काट लिया धरम ने। बाप हार गया बेटे से! जबसे […] - [संस्कारहीन](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%a8/): “गाड़ी नहीं हुई….बस से निकल जाओ।” पिताजी आकर रुखे लहजे में बोल गये। वे सहज होने की चेष्टा कर रहे थे, परंतु क्रोध उनके चेहरे से साफ चू रहा था। आखिर हुआ क्या! “लेकिन कल शाम उनसे मेरी बात हो गई थी। बोला कि गाड़ी खाली है कल के लिए। फिर आज….!” “खाली है तो रहने दो….नहीं जाना है उसकी गाड़ी से…!” वे गुस्से से एकदम लाल थे। “लेकिन हुआ क्या सो….?” मैंने डरते-डरते पूछा। “सुबह- सुबह पीकर तैयार था ‘जगता’। वही गाड़ी चलाकर जाता….हम अपने परिवार को उनके साथ नहीं भेज सकते…संस्कारहीन कहीं का….दारूबाज….!” जगतनारायण को ‘जगता’ कहने से […] - [हत्यारा कौन](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%8c%e0%a4%a8/): “मास्टर साहब! कैसे हैं आप?” मेरा इतना पूछना था कि वे फफक पड़े। गोद में बैठा हुआ करीब तीन साल का बालक और जोड़ से रो पड़ा। बाप और बेटे का ताजा मुंडित सिर तथा उनका विगत पन्द्रह दिनों से अनुपस्थित रहना सब कुछ बयाँ कर रहा था। इसलिए मैं बस इतना ही कह पाया कि भगवान आपको इस संकट से उबरने की शक्ति दें! यह सब कैसे हो गया! “लक्ष्मी आयी थी….. सब कुछ लेकर चली गयी……मैं अकेला अब….”। शेष शब्द आँसू की धारा में बह गये। मुझे समझते देर न लगी कि गोद में बैठा हुआ अबोध बालक […] - [कोशी पुत्र](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%b6%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0/): ‘किसन अधपगला है ! गंजेड़ी- भंगेड़ी है, जो मन में फुराता है, वही करने में रम जाता है! कोशी की कछेर में थोड़ी- सी जमीन क्या जगी, चला खेसारी छींटने!’ घाट पर खड़े लोग उस पर तरह-तरह के व्यंग्य कर रहे थे-‘सुआ न सुतारी, जूते का व्यापारी’।अब तो लोग उसमें एक और पंक्ति जोड़ने लगे हैं-‘खेती न पथारी, परवल की तरकारी’। लेकिन किसन अलमस्त आदमी है। कोई कुछ कहे, करता वह हमेशा अपने मन की है। वह खेसारी छींट कर खेत के कोने पर पथिया झाड़ दिया और घर की ओर चलता बना। उसने किसी से कुछ नहीं कहा। वैसे […] - [मोहनदास नैमिशराय की कहानी 'कर्ज' : दलित प्रतिरोध की मुखर अभिव्यक्ति](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%a8%e0%a5%88%e0%a4%ae%e0%a4%bf%e0%a4%b6%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%a8/): दलित- साहित्य लेखन- परंपरा में बहुमुखी प्रतिभासंपन्न कथाकार मोहनदास नैमिशराय वह नाम है, जिसके बिना दलित- साहित्य अधूरा है। सही अर्थों में दलित- साहित्य का मूलभूत इतिहास मोहनदास नैमिशराय से ही आरंभ होता है। मोहनदास नैमिशराय ने अपनी बहुत प्रतिभा से साहित्य की अनेक विधाओं को समृद्ध किया है। वे एक साथ कवि, कथाकार और आलोचक के रूप में चर्चित हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- ‘अपने-अपने पिंजरे’ (आत्मकथा); ‘मुक्तिपर्व’, ‘वीरांगना झलकारी बाई’, ‘आज बाज़ार बंद है’, ‘क्या मुझे खरीदोगे?’ (उपन्यास); ‘आवाजें’, ‘हमारा जवाब’ (कहानी- संग्रह) ‘सफदर का बयान’, ‘आग और आंदोलन’ (कविता संग्रह); ‘अदालतनामा’ (नाटक); ‘दलित पत्रकारिता : सामाजिक और […] - [आधुनिक भारत के निर्माता भीमराव अम्बेडकर](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%ad/): आधुनिक भारत के निर्माण में जिन महापुरुषों की महनीय भूमिका है, उनमें बाबासाहब भीमराव अंबेडकर अग्रगण्य हैं। उन्होंने ही आधुनिक भारत में विविध विषमता के खिलाफ समतामूलक समाज की स्थापना पर सर्वाधिक जोर दिया। सही अर्थ में आजाद भारत का जो स्वरूप है, वह निश्चय ही बाबासाहब की देन है। बाबासाहब का जन्म 14 अप्रैल,1891 ई. में महाराष्ट्र के रत्नागिरि नामक स्थान पर एक तथाकथित अछूत परिवार में हुआ। यही कारण है कि उनके स्वयं का जीवन ही उनकी अनुभूति का खजाना है। अछूत परिवार में उत्पन्न होने के कारण उन्होंने जड़तावादी तथा रूढ़िग्रस्त भारतीय समाज में व्याप्त विषमता के […] - [कथा सम्राट प्रेमचंद : जीवन और सृजन](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%95%e0%a4%a5%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%9f-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8/):             प्रेमचन्द का हिन्दी कथा- साहित्य में शीर्ष स्थान है। उनका जन्म सन् 1880 ई० में बनारस से पाँच-छह मील दूर लमही नामक गाँव में हुआ था। उनका बचपन का नाम ‘धनपतराय’ था। चाचा उन्हें स्नेह से नवाबराय कहा करते थे। पिता का नाम मुंशी अजायबराय और माता का नाम आनन्दी देवी था। खेती- पथारी उनके परिवार का मुख्य पेशा था, किन्तु निर्धनता के कारण परिवार का पालन-पोषण अत्यन्त कठिनाई के साथ हो पाता था। विवश होकर पिता को नौकरी करनी पड़ी। उस समय उनके पिता को बीस रूपया मासिक वेतन मिलता था। यद्यपि पिता […] - [वो नकचढी लड़की](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b5%e0%a5%8b-%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a4%9a%e0%a4%a2%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a4%95%e0%a5%80/):             राकेश ने अभी गाड़ी स्टार्ट किया ही था कि फिर से फोन बज उठा -“तुमने हेल्मेट लगाया या नहीं….?”           “हाँ, यार लगा लिया। लंच भी ले लिया….पानी भी पी लिया….और बोलो!”             “ऐसे क्यों बोलते हो! पूछकर गुनाह किया क्या….नहीं पूछूँगी कल से!” राकेश की बातों से आहत हो गई कुमकुम।             “ओह! तुम भी न, तुरत रूठ ही जाती हो….नाक पर ही गुस्सा रहता है! इसीलिए तो तुम्हें नकचढ़ी कहता हूँ….तुम नहीं पूछेगी तो कौन पूछेगी!” राकेश ने पुचकार कर […] - [प्रेमचंद : भारतीय स्वाधीनता के स्वप्न-द्रष्टा](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a5%80%e0%a4%a8-2/): पराधीन भारत में स्वाधीन भारत के स्वप्नद्रष्टा कथाकार प्रेमचंद मूल रूप से सत्याग्रह- युग के लेखक हैं। उनका रचनात्मक मन भारत के राष्ट्रीय मुक्ति-आंदोलन की चेतना से निर्मित है। उनके संपूर्ण रचनात्मक अवदानों के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का अपूर्व- अद्वितीय कथाकार कहा जा सकता है। अपने समय के समाज और राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप करने वाले प्रेमचंद एक पूरी सदी के बाद भी ‘आउटडेटेड’ नहीं हुए हैं। उनका साहित्य अपने समय का सामाजिक- राजनीतिक दस्तावेज है। इसीलिए प्रसिद्ध आलोचक रामविलास शर्मा ने उनके बारे में कहा है कि “जब कभी उत्तर भारत का इतिहास खो जाए तो […] - [औरत न होने का दर्द : जीवन की व्याख्या करती कहानियाँ](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%94%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%a8-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6-%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b5/): मिथिलांचल के प्रेमचन्द कहे जाने वाले वरिष्ठ साहित्यकार रामबाबू नीरव हिन्दी के ऐसे प्रतिभासंपन्न कथाकार हैं, जो अपनी कहानियों में हमेशा मनुष्य, समाज और परिवार की तमाम समस्याओं, संकटों और चुनौतियों को उठाते रहे हैं। उनके रचनात्मक सरोकार अपने व्यापक परिप्रेक्ष्य में जीवन के बहुआयामी संदर्भों की व्याख्या करते हैं। वे बाहरी जीवन के जटिल यथार्थ को जितनी सघनता से व्यक्त करते हैं, उतनी ही सघनता और पूर्णता के साथ मानवीय भावनाओं तथा संवेदनाओं को भी उजागर करते हैं। उनकी कहानियों का विषय हमेशा सामाजिक मुद्दे रहे हैं, परंतु संबंधों का मनोविज्ञान भी वे अत्यंत गहराई के साथ अभिव्यक्त करते […] - [आईने में समय : अपने समय का आईना](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%86%e0%a4%88%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%af-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%86%e0%a4%88/):  ‘आईने में समय’ : अपने समय का आईना              हिन्दी के युवा कथाकार बलराम कुमार रचित कहानी- संग्रह ‘आईने में समय’ की अधिकांश कहानियाँ वर्तमान समय का आईना है। इस आईने में जितना साफ हमारा समय दिखता है, उससे कहीं अधिक साफ कथाकार का संवेदनात्मक व्यक्तित्व झलकता है। इस संग्रह की कहानियाँ रचनाकार की जीवनानुभूतियों की कलात्मक तथा मार्मिक अभिव्यक्ति है। इन कहानियों में कहीं रचनाकार का अस्तित्वबोध है, तो कहीं अपनी अस्मिता की खोज में तत्पर पात्रों की बेचैनी। कुछ कहानियाँ लेखक के विक्षुब्ध मनोभाव की अभिव्यक्ति है, तो कुछ अंत:सलिला की भाँति मानव […] - [नागार्जुन (यात्री जी) की मैथिली कविताओं में आधुनिकता](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9c%e0%a5%81%e0%a4%a8-%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%9c%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%88/): भारत के करोड़ों दलित, शोषित ,पीड़ित, वंचित वर्ग ही नहीं, राज और समाज के लिए प्रतिबद्ध नागार्जुन जन्म से कवि, प्रकृति से घुमक्कड़ और विचार से शुद्ध मार्क्सवादी हैं। साहित्य की आभिजात्य तथा लोक-परंपरा के बीचोंबीच अपना मार्ग बनाते हुए कबीर की भाँति फक्कड़ तथा शासन और सत्ता से बेखौफ टकराने वाले नागार्जुन स्वाधीन भारत के सबसे क्रांतिकारी कवि हैं। इनके बारे में डाॅ. बच्चन सिंह ने लिखा है- “महात्मा गाँधी के अहिंसा- सिद्धांत और हृदय परिवर्तन में उन्हें कोई आस्था न थी…. किन्तु जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति- आंदोलन में उन्होंने सक्रिय योगदान दिया।…..सन् 1962 में चीनी आक्रमण के […] - [प्रेमचंद की दार्शनिकता](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b6%e0%a4%a8%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be/): आधुनिक भारतीय साहित्याकाश में प्रेमचंद एक देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिसके आलोक में भारत के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास का निर्माण किया जा सकता है। प्रेमचंद भारत के पर्याय हैं। वे हाशिए का जीवन जी रहे करोड़ों भारतीय की आवाज हैं। रामविलास शर्मा ने उनके बारे में ठीक ही कहा है-‘अगर भारत का इतिहास कहीं खो जाए या नष्ट हो जाए, तो प्रेमचंद का साहित्य पढ़कर देश का नया इतिहास लिखा जा सकता है।’ भारतीय समाज कितना भी बदल जाए, प्रेमचंद की प्रासंगिकता बरकरार रहेगी। जिस समय भारतीय समाज पूरी तरह बदल जाएगा, उस समय प्रेमचंद का साहित्य भारतीय […] - [दिनकर का सांस्कृतिक चिंतन](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a4%95%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%95%e0%a5%83%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95-%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a4/): कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा से संपन्न हिन्दी के अघोषित राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर राग और आग के कवि हैं। पराधीन भारत में पैदा हुए दिनकर स्वाधीन भारत के सबसे क्रांतिकारी कवि हैं। उनकी कविताओं में एक ओर भारत की स्वाधीनता और समता की मांग है, तो दूसरी ओर भारत का उदात्त संस्कृति का मूलभूत चिंतन। दिनकर जी बहुआयामी प्रतिभा के धनी साहित्यकार हैं। उनकी प्रतिभा के आलोक से साहित्य की कोई भी विधा जगमगा उठती है। उनके विराट व्यक्तित्व को जितनी स्वीकृति और ख्याति एक कवि के रूप में मिली है, ठीक उतनी ही गद्य में भी। रामचंद्र शुक्ल ने […] - [सीता का शास्त्रीय संदर्भ : एक विश्लेषणात्मक अध्ययन](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a4%be%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ad/): भारत में अनादिकाल से ही पुरुषवादी सामाजिक परंपरा ने स्त्री की स्वतंत्र सत्ता को नकारा है। उन्हें सदैव मुख्यधारा से बाहर रखा है। समाज के निर्माण में पुरुष से अधिक भूमिका निभाने वाली स्त्री को कभी महत्त्वपूर्ण माना ही नहीं गया। न उनके श्रम का हिसाब हुआ, न ही उसका सही इतिहास लिखा गया। अतएव, यह कहना कि इतिहास के रूप में ‘जो कुछ लिखा गया है’, वह महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि वह अधिक महत्वपूर्ण है, ‘जो लिखा न जा सका’। जिसे अक्सर दबा दिया गया। मुख्यधारा के मुट्ठी भर लोगों ने समाज के एक बड़े वर्ग को हाशिए पर […] - [समाजवाद, राष्ट्र और चन्द्रशेखर](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b7%e0%a5%8d%e0%a4%9f%e0%a5%8d%e0%a4%b0-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%8d/): समाजवादी विचारधारा ने जितनी अधिक हलचल वर्तमान शताब्दी में उत्पन्न की है, उतनी अन्य किसी भी विचारधारा ने नहीं। आज ‘समाजवाद’ अन्य किसी भी विचारधारा की अपेक्षा अधिक व्यापक है। किसी -न – किसी रूप में यह संसार के करोड़ों मानवों का धर्म-सा बन गया है तथा उनके विचारों एव॔ कार्यों की रूपरेखा निर्धारित करता है। ‘समाजवाद’ तथा ‘समाजवादी’ शब्दों को विविध अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है, फिर भी शब्द और अर्थ का घनिष्ठ सम्बन्ध है। ‘समाजवाद’ शब्द भी इन सिद्धान्त का अपवाद नहीं है। ‘समाजवाद’ शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘सोशलिज्म’ का हिन्दी रूपान्तर है। ‘सोशलिज्म’ शब्द लैटिन भाषा […] - [समाजवाद और आचार्य नरेन्द्र देव](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%86%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%af-%e0%a4%a8%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6/): समाजवादी विचारधारा ने जितनी अधिक हलचल वर्तमान शताब्दी में उत्पन्न की है, उतनी अन्य किसी भी विचारधारा ने नहीं। आज ‘समाजवाद’ अन्य किसी भी विचारधारा की अपेक्षा अधिक व्यापक है। किसी -न – किसी रूप में यह संसार के करोड़ों मानवों का धर्म-सा बन गया है तथा उनके विचारों एव॔ कार्यों की रूपरेखा निर्धारित करता है। ‘समाजवाद’ तथा ‘समाजवादी’ शब्दों को विविध अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है, फिर भी शब्द और अर्थ का घनिष्ठ सम्बन्ध है। ‘समाजवाद’ शब्द भी इन सिद्धान्त का अपवाद नहीं है। ‘समाजवाद’ शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘सोशलिज्म’ का हिन्दी रूपान्तर है। ‘सोशलिज्म’ शब्द लैटिन भाषा […] - [सुबह का अर्घ्य](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a5%81%e0%a4%ac%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%98%e0%a5%8d%e0%a4%af/): सोमू की छुट्टी का आवेदन अभी स्वीकृत भी नहीं हुआ था, पर वह गाँव जाने के जोश में पूरी तैयारी कर बैठा। माँ के लिए एक जोड़ी साड़ी, पिताजी के लिए एक जोड़ धोती और बंडी, बहन के लिए फ्राॅक- सूट और दुपट्टा, भाई के लिए जिंस, सर्ट और ब्लेज़र, तीन प्रकार की मिठाईयाँ  खरीद कर वह पैक कर चुका था।           इस बार छठ में जाना है तो जाना है। उसके मन की दमित इच्छाओं का विस्फोट हो चुका था! तब वह मात्र तीन साल का रहा होगा। पिताजी ने  पीठ पर  करीब उसके आधे वज़न […] - [शंखनाद : मानवीय जिजीविषा एवं संघर्ष की महागाथा](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b6%e0%a4%82%e0%a4%96%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a6-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%9c%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%b7%e0%a4%be-%e0%a4%8f/): ‘शंखनाद’ उपन्यास हिन्दी के चर्चित कथा- शिल्पी रामबाबू नीरव का पाँचवाँ उपन्यास है। यह उपन्यास इसी वर्ष (2023 ई0) प्रतिभा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर से प्रकाशित हुआ है। अपने कलेवर में यह उपन्यास सामान्य है, परंतु इसका कथ्य अत्यंत विराट और समसामयिक है। यह उपन्यास निश्चय ही प्रभावोत्पादक है। कारण, अपनी इस रचना में उपन्यासकार एक ओर इक्कीसवीं शती के तीसरे दशक में बढ़ रहे भूमंडलीकरण और बाजारवाद के प्रसार तथा उससे उत्पन्न संकटों की ओर इसका इशारा करते हैं, वहीं दूसरी ओर एक आम आदमी की अदम्य जिजीविषा तथा अनवरत संघर्ष का महाआख्यान प्रस्तुत करते हैं। ‘शंखनाद’ न केवल सत्ता और […] - [अपराध- बोध](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a7-%e0%a4%ac%e0%a5%8b%e0%a4%a7/): – “सर….सर…..सर जी…..!” किसी ने मुझे पीछे से पुकारा। इस भीड़ भरी सड़क पर मुझे इस तरह कौन बुला सकता है! दरभंगा का नाका नंबर पाँच वैसे ही जाम को लेकर बदनाम है। यहाँ रुकने का मतलब है जाम कारण बनना। पुलिस वाले से माँ- बहन सुनना। यूँ ही भीड़ के कारण मेरी गाड़ी कछुए की चाल में चल रही थी। मैं अनजान बने बढ़ता रहा……….. आवाज और भी तेज हो गई- “सर…सर…सर….!” मेरी गाड़ी के सामने एक अनजान युवक आकर खड़ा हो गया, “सर आपने मुझे पहचाना नहीं…..मैं उदय…..उदय साहु…..आपका विद्यार्थी।” मैंने उन्हें अपनी स्मृतियों में खंगालने की कोशिश […] - [अतिक्रमण](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%85%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae%e0%a4%a3/): बह का समय और गर्मी का मौसम,जिसमें रमजानी अपना तरकारी वाला ठेला लिए हुए बाजार की ओर चला था।मन में अनंत कामनाएँ हिलोरें ले रही थीं। कल ईद है। घर में सेबईयाँ बनेगी…. खीर, पकवान और न जाने क्या- क्या…. ?        चारों तरफ हलचल मची है। सभी खरीद- बिक्री करने में जुटे हैं। कोई अपने लिए नयी कमीज बनवा रहा है तो कोई अपनी बीबी के लिए सूट-सलवार का नाप देने जा रहा है। किसी को बच्चे के लिए नये कपड़े खरीदने हैं तो किसी खिलौने। किसी को दूध की पड़ी है, इसीलिए बदना लिए भागे जा […] - [ऐसा पाठ पढ़ा पुत्ता.....अपने सिर बिसानी](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%90%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%a0-%e0%a4%aa%e0%a4%a2%e0%a4%bc%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%85%e0%a4%aa%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b8/): गुनेसर को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि गोपी पर कुुुुत्ते का  विष चढ़ चुका है। ‘रेबीज’ उसके खून में परिपक्व हो चुका है, इसीलिए वह कुत्ते की तरह भौंक रहा है और लोगों को काटने दौड़ता है। विश्वास भी कैसेे हो,  उसने तो दो साल पहले कुुुुत्तेके काटने के अगले दिन से ही उसकी नंगी पीठ पर पितरिया थाली साट-साट कर विष झाड़ दिया था। जब उसने बड़े-बड़े विषधर के काटे हुए को माथे पर से विष उतार दिया है तो ये कौन- सी बड़ी बात है। जिसके देह पर साक्षात भगवती, गहील, कारू खिरहर, कमला माय, भुईयाँ […] - [मर्दानी](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%ae%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%80/): – “क्या नाम है?” – “दुलारी देवी।” – “पति का नाम?” – “स्वर्गीय किसुन राय? – “वार्ड नंबर ?” – “बारह।” – “कितना खेत दहाया है?” – “दो बिगहा सात कट्ठा सरकार।” – “रसीद कटवाती है?” मुंशी जी ने चश्मे के ऊपर से उसे देखा। सफेद वस्त्र में लिपटी हुई एक दुखियारी अधेड़ स्त्री निरीह भाव से उनके सामने खड़ी थी। उसके गेहुंए रंग काले पड़ गये थे। – “झूठ बोलती है जनानी।” पीछे से कतार में खड़े चानो यादव ने अपना टांग अड़ाया, “इसके पास पाँच-सात कट्ठा जमीन बची है सर। रसीद मांगिये।” पता नहीं, चानो यादव उनसे किस […] - [राम : भारतीय मानस की सर्वोत्तम कल्पना](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a5%8b%e0%a4%a4/): ‘राम’ शब्द जहन में आते ही मन- मस्तिष्क में सादगी से भरी हुई, धनुष धारण किए हुए श्याम वर्ण के एक दिव्य पुरुष की छवि उभर आती है। मन शुचिता से लबालब हो जाता है। हृदय भाव- विभोर हो जाता है! और शब्द चूने लगते हैं! साथ ही मन में कई अनुत्तरित प्रश्न भी उमड़ने लगते हैं कि आखिरकार ‘राम’ कौन थे?… क्या थे?… राम कहाँ उत्पन्न हुए?…. राम कब हुए?….राम मिथ है या यथार्थ?….राम पौराणिक हैं या ऐतिहासिक……? कुछ लोग तो यह भी कहने लगे हैं कि राम सर्वथा काल्पनिक हैं। इस नाम कि कोई व्यक्ति कभी हुआ ही […] - [अछूत की शिकायत : दलित दंश की मार्मिक अभिव्यक्ति](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%85%e0%a4%9b%e0%a5%82%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b6%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%a4-%e0%a4%a6%e0%a4%82%e0%a4%b6-%e0%a4%95%e0%a5%80/): भारतीय समाज की आभिजात्यवादी परंपरा के खिलाफ लोक-परंपरा का शंखनाद निरंतर जारी रहा है। वर्ण-भेद की मानसिकता के खिलाफ विद्रोह, इसका सबसे प्रखर रूप है। वर्ण-भेद के कारण ही हमारे देश में मुखस्य तथा पदस्य संस्कृति का विकास हुआ। ‘ऋग्वेद’ के प्रक्षिप्त अंश ‘पुरुष-सूक्त’ के अनुसार ‘ब्राह्मण’ ब्रह्मा जी के मुख से उत्पन्न हुआ और ‘शूद्र’ उनके चरण से! मुख से उत्पन्न होने के कारण ब्राह्मण पवित्र माने गये और वे उछलकर वर्ण-व्यवस्था के शीर्ष पर स्थित हो गये। समाज में उनकी पूजा होने लगी, लेकिन चरण से उत्पन्न शूद्र को सबसे निकृष्ट, उपेक्षित और अस्पृश्य माना गया। शूद्रों को […] - [बुचिया डायन नहीं थी......](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%9a%e0%a4%bf%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%a8-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%a5%e0%a5%80/): ‘नहीं बचेगी किरण!’ तलबे का जहर मगज पर चढ़ता है और मगज का जहर तलबे तक! उसे विषधर ने काटा है!बरसात की इस रात में ठंडी-ठंडी बरसाती हवा बह रही है, लेकिन महेसर के माथे पर पसीना चुहचुहा रहा है। वह घंटे भर से झाड़-फूँक में लगा है, पर किरण की स्थिति बिगड़ती ही जा रही है। यह काल विकराल रात्रि है जगदीश के लिए! आज परीक्षा है महेसर की। पूरे गाँव के लोग तमाशा देख रहे हैं। महिलाएँ एक- दूसरे के कानों से मुँह सटाकर फुसफुसा रही हैं – – यह उसी डायन जीबछी की करतूत है सब! – […] - [स्वाधीनता-संग्राम की गुमनाम योद्धा वीरांगना अजीजन बाई](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a5%80%e0%a4%a8%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%ae-2/): भारत ही नहीं वरन् अखिल विश्व में दोयम दर्जे पर स्थित संपूर्ण स्त्री-जाति को अपनी पहचान के लिए सदैव संघर्ष करना पड़ा है। आज हम प्रगतिशीलता का चाहे कितना ही दंभ क्यों न भर लें, परंतु यह किसी से छिपा नहीं है कि विश्व के किसी भी समाज ने स्त्री के व्यक्तित्व को सहजता से पनपने न दिया। यह पीड़ा तब और अधिक त्रासद हो जाती है, जब कोई स्त्री दलित – वंचित परिवार में उत्पन्न हुई हो। ऐसी स्थिति में उसे वर्णवाद और लिंगवाद की दोधारी तलवार पर चलते हुए अपने अस्तित्व के लिए लड़ाई लड़नी पड़ती है। और […] - [रहना नहीं देश बिराना.....](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%a6%e0%a5%87%e0%a4%b6-%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%be/): घर पहुँचते ही भाई ने बताया कि मौलवी साहब नहीं रहे! तीन महीने पहले ही ‘हृदयाघात’ से उनकी मृत्यु हो गयी! मेरी साँस रूक गयी, कुछ क्षण के लिए। पता नहीं, किस अशुभ मुहूर्त में मैं अपने गाँव आया! सोचा था कि मौलवी साहब से मुलाकात होगी। फिर कितनी बात होगी। मेरा सपना पूरा हो गया, मैं लेक्चरर बन गया। यह जानकर उन्हें कितनी खुशी होगी! पर नसीब में कुछ और ही था! मौलवी साहब को अभी नहीं जाना चाहिए था ! अभी उम्र ही क्या हुई थी उनकी -पचास-पचपन की। जब दिन रात हमलोग ईश्वर से मनाते रहे कि […] - [हिन्दी काम भी और नाम भी](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%ad%e0%a5%80/): प्रिय पाठकों! लोग अक्सर पूछते हैं कि आज दुनिया कहाँ से कहाँ चली गयी है! लोग चाँद और मंगल ग्रह पर बस रहे हैं। वैज्ञानिक आविष्कारों ने चमत्कृत कर दिया है। विज्ञान ने संसार के सारे रहस्यों का उद्भेदन कर दिया है। इस जमाने में लोग अंग्रेजी पढ़कर बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं। पैसा कमा रहे हैं! नाम कमा रहे हैं। ऐसे में हिन्दी पढ़े-लिखे को कौन पूछता है?……..जब काम ही नहीं मिलेगा तो लोग हिन्दी पढ़कर क्या करेंगे? सच पूछा जाय तो यह सवाल ही गलत है। यह कहना कि अंग्रेजी पढ़कर वे लोग सफल हो […] - [स्वाधीनता-संग्राम की गुमनाम योद्धा वीरांगना अजीजन बाई](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a5%80%e0%a4%a8%e0%a4%a4%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%97%e0%a5%81%e0%a4%ae/): स्वाधीनता-संग्राम की गुमनाम योद्धा वीरांगना अजीजन बाई – डाॅ. उमेश कुमार शर्मा भारत ही नहीं वरन् अखिल विश्व में दोयम दर्जे पर स्थित संपूर्ण स्त्री-जाति को अपनी पहचान के लिए सदैव संघर्ष करना पड़ा है। आज हम प्रगतिशीलता का चाहे कितना ही दंभ क्यों न भर लें, परंतु यह किसी से छिपा नहीं है कि विश्व के किसी भी समाज ने स्त्री के व्यक्तित्व को सहजता से पनपने न दिया। यह पीड़ा तब और अधिक त्रासद हो जाती है, जब कोई स्त्री दलित – वंचित परिवार में उत्पन्न हुई हो। ऐसी स्थिति में उसे वर्णवाद और लिंगवाद की दोधारी तलवार […] - [वीरांगना झलकारी बाई : भारतीय स्वाधीनता-संग्राम की गुमनाम योद्धा](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b5%e0%a5%80%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%9d%e0%a4%b2%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-2/): भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के इतिहास में आरंभ से लेकर अबतक आभिजात्यवादी विचारधारा के खिलाफ एक समानान्तर धारा लगातार टकराती रही है। इस धारा ने समय -समय पर अनेक आंदोलन और क्रांतियों को उत्पन्न किया। इस प्रतिरोधी धारा के आंदोलन और क्रांतियों में दलित-अस्मिता के सवाल पर सहमति-असहमति का संघर्ष चलता रहा है। तथापि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में प्रतिरोधी शक्तियाँ और उग्र हो गयीं और भारत में क्रांति, अस्मिता, रूढ़ियों से मुक्ति तथा मानवतावादी मूल्यों की स्थापना का स्वर अपेक्षाकृत प्रखर हो गया, जिसकी परिणति भारतीय स्वाधीनता-संग्राम और लोकतंत्र की स्थापना में हुईं।           भारतीय समाज की बिडंबना रही है […] - [लावारिश](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%b6-2/): पूस का महीना और कँपकपाती अंधेरी रात,जिसमें कुहरे के विशालकाय पर्वत को दो फाँक करते हुए, सर्द पछुआ हवा से टकराते हुए ‘कमलागंगा एक्सप्रेस’ समस्तीपुर जंक्शन पर धड़धड़ा का रुक गया। गाड़ी के रुकते ही दर्जनों काले कोटधारी उसमें यम की भाँति प्रवेश कर गये। यात्रियों में हड़कंप मच गया। कुछ इधर-उधर भागे तो कुछ लोग अपने गुप्तांगों को कुरयाते हुए लघुशंका के निमित्त शौचालय का दरबाजा खटखटाने लगे। लेकिन कुशाग्र बुद्धि के यात्री उसमें पहले से ही दीर्घशंका- निवृत्ति हेतु आसन ग्रहण कर चुके थे।          रात के करीब ग्यारह बज रहे थे, इसलिए कुछ यात्रीगण […] - [कबीर का समय और समाज](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%95%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%b0-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%af-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9c/): साहित्य वर्तमान की कोख से निकलकर अतीत और भविष्य दोनों को आलोकित करता है। साहित्यकार जिस सामाजिक- सांस्कृतिक परिवेश में पैदा होता है, जहाँ से वह शिक्षा और संस्कार ग्रहण करता है, जाने- अनजाने में वहाँ का परिवेशगत यथार्थ उनकी रचनाओं अभिव्यक्त होता चला जाता है। इसलिए साहित्य की सामाजिक सापेक्षता को कदापि नकारा नहीं जा सकता। साहित्य और समाज में गहरा अंतर्संबंध होता है। साहित्य समाज को प्रभावित करता है और समाज साहित्य को। साहित्य की सामाजिक सापेक्षता पर प्रकाश डालते हुए मैनेजर पांडेय कहते हैं- “साहित्य का अस्तित्व समाज से अलग नहीं होता, इसलिए साहित्य का विकास समाज […] - [कैंडिल मार्च](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%9a/): एक महिला चिकित्सक के साथ सामूहिक दुष्कर्म तथा उसे जिन्दा जला देने के खिलाफ़ पूरा देश उबल पड़ा। क्या बूढ़े, क्या जवान सभी सड़क पर उतर आये। जगह-जगह ‘कैंडिल मार्च’ शुरू हो गया। नारे लगने लगे-       “अपराधी को फाँसी दो! फाँसी दो! फाँसी दो!   नारी कोई खिलौना नहीं! खिलौना नहीं…..”                     लोगों और खासकर युवाओं में इस तरह की सजगता देखकर कनक मन ही मन खुश हो रही थी। अब किसी लड़की के साथ ऐसा नहीं होगा। कैंडिल मार्च में भाग लेने से उनके भीतर की आग शांत हो रही […] - [प्रेमचंद : भारतीय स्वाधीनता के स्वप्न- द्रष्टा](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%ae%e0%a4%9a%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4%e0%a5%80%e0%a4%af-%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a5%80%e0%a4%a8/): पराधीन भारत में स्वाधीन भारत के स्वप्नद्रष्टा कथाकार प्रेमचंद मूल रूप से सत्याग्रह- युग के लेखक हैं। उनका रचनात्मक मन भारत के राष्ट्रीय मुक्ति-आंदोलन की चेतना से निर्मित है। उनके संपूर्ण रचनात्मक अवदानों के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का अपूर्व- अद्वितीय कथाकार कहा जा सकता है। अपने समय के समाज और राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप करने वाले प्रेमचंद एक पूरी सदी के बाद भी ‘आउटडेटेड’ नहीं हुए हैं। उनका साहित्य अपने समय का सामाजिक- राजनीतिक दस्तावेज है। इसीलिए प्रसिद्ध आलोचक रामविलास शर्मा ने उनके बारे में कहा है कि “जब कभी उत्तर भारत का इतिहास खो जाए तो […] - [वह दीपावली नहीं भूल पाया हूँ…….](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%b5%e0%a4%b9-%e0%a4%a6%e0%a5%80%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%b2%e0%a5%80-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82-%e0%a4%ad%e0%a5%82%e0%a4%b2-%e0%a4%aa%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%b9/): वर्ष 2011 की दीपावली नहीं भूल पाया हूँ अब तक! तब मैं प्रथम श्रेणी से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण कर नेट/जेआरएफ की तैयारी में लगा था। अबतक दो बार इस परीक्षा में विफलता मिल चुकी थी, इसलिए दिसम्बर में होने वाली परीक्षा में कोई कोर- कसर नहीं छोड़ना चाह रहा था। जरूरत की सारी किताबें चाट गया था मैं! सामने दीपावली थी। घर से बार-बार बुलावा आ रहा था, लेकिन मैं कौन-सा मुँह लेकर गाँव जाता। एम.ए. में सर्वाधिक अंक लाकर जो प्रतिष्ठा मैंने अर्जित की थी, वह नेट की परीक्षा में दो बार फेल करके गवां चुका था। आस-पड़ोस […] ## Pages - [Newsletter](https://aankhindekhi.com/newsletter/): [newsletter] - [Direct Post Submission Form](https://aankhindekhi.com/direct-post-submission-form/) - [परिचय](https://aankhindekhi.com/%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%af/): नाम : डाॅ. उमेश कुमार शर्माजन्म : 15 अगस्त, 1985 ई., सहरसा (बिहार)योग्यता : एम.ए., पी-एच.डी. (हिन्दी)             नेट/जेआरएफ/एसआरएफ उत्तीर्ण। रूचियाँ : साहित्यिक लेखन एवं अध्यापन।अवदान : देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में चर दर्जन  से अधिक कहानियाँ और  शोध-आलेख प्रकाशित।            आकाशवाणी से कहानियाँ का प्रसारित।            कुछ  कहानियों का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद।           “आँखन देखी” नामक ब्लॉग तथा फेसबुक पेज पर सक्रिय लेखन।          10 वें विश्व हिन्दी सम्मेलन समेत अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय  संगोष्ठी में सक्रिय प्रतिभागिता।         सम्मान/ पुरस्कार : […] [comment]: # (Generated by Hostinger Tools Plugin)